श्री योगवाशिष्ठ-भाषा | Shri Yogvashishtha-Bhasha

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Shri Yogvashishtha-Bhasha by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| मोगवाशिष्ट-माषा ® १३ न 29 न 9 2 9 9 9 99 98 0 0994009 | स्नान दान ओर जप तप करते हुये एक वर्ष में यात्रा समाप्त करे फिर | अपने नगर को लौट आये । नगर वासियों ने वडा उत्सव किया । राजा दशरथ सहित समस्त राज़महल में आनन्द छा गया श्री योगवाशिष्ठ-बराग्य प्रकरण का दूसरा सगे समाप्त ॥ २ ॥ ¶ ১. ;-& विश्वामित्रागमन वणन ৃ उस समय राजकुमार रामजी की अवस्था सोलह वष में कुछ ही | | कम थी । इससे वे नित्य प्रति महाराज दशरथ की आज्ञा प्राप्त करके | ॥ भाइयों सहित आखेट ( शिकार ) खेलने जाया करते थे और बनमें | | सुन्दर २ परविघ्र मृगो को मारकर राजा को लाकर दिखाते थे । कीं | | गेंद खेलते तो कहीं भाइयों और मित्रों के साथ स्नान और सन्ध्या | 4 बन्दनादिक क्रियाओं को करते हये नगर वासियों को सव॑दा दी प्रस | ॥ रखते थे । परन्तु ज्योंदी सोलह वर्ष पूरे हुये कि एक दिन सहसा उनका | | चित्त संसार की समस्त लीलाओं से उपराम हो गया और उच्होंने ६ खाना-प्रीना, खेलना कूदना, देना-लेना ओरं यहां तक कि सोना-उठना | ओर किसी से बोलना मी त्याग करं एकं अन्धेरीं कोटरी में अपना / १ आवास बना लिया । कोई कितना ही कहता, वे उधर बिल्कुल ही |; ॥ ध्यान न देते थे और देखने से ऐसा मालूम होता था कि मानों किसी | | गहरी चिन्ता में पड़े हुये हैं। चिन्ता मनुध्य के शरीर को भक्तण | कर, जाती है-इस नियम से रामजी दिन दिन दुबले होते गये । शरीर | सूख कर लकड़ी हो गया मुख पीला पड़ गया । परन्तु जहां उनके ॥ शरीर में इतनी निबंलता आ गई थी वहां यह अवश्य हुआ कि इच्छा | | रहित होने से उनका मन, निर्मल होगया। जंब देखो चिजुक | | ৩ ` ` । |




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