परीक्षा मुख | Pariksha Mukh

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
202
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)आयार्यप्रवर श्री माणिक्यनत्दिविरचित
प्रीक्षामुख सटीक
प्रथमः प्रिच्छेदः
ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा ओर उद्देश्य
प्रमाणादर्थससिद्धि - स्तदाभासाद्िपर्ययः।
इति वक्ष्ये तयो-्लक्ष्म्, सिद्धमल्प् लघीयसः।
अन्वय - अहं वक्षये। किं तत्? लक्ष्म। किं विशिष्टं लक्ष्म? सिद्धम्।
पुनरपिकथंभूतं ? अल्पं। कान्? लघीयसः। कयोस्तल्लक्ष्म? तयोः प्रमाण
तदाभासयोः। कृतः? यत्तः अर्थस्य संसिद्धि भवति। कस्मात्? प्रमाणात्।
विपर्ययः भवति। कस्मात्? तदाभासात् इति शब्दः हेत्वर्थे इति हेतोः।
श्लोकार्थं - प्रमाणात् = प्रमाण से (सम्यग्त्ान), अर्थं = पदार्थ कौ
(प्रयोजन) संसिद्धिः = सम्यक्सिद्धि, तदाभासात् = उस प्रमाणाभास से,
विपर्ययः = विपरीत (सम्यक् सिद्धि नही होती), इति = इस प्रकार, वक्ष्य
= करहगा, तयो: = उन दोनों के (प्रमाण ओर प्रमाणाभास के) लक्ष्म = लक्षण
को, सिद्धम् = पूर्वाचार्यो से प्रसिद्ध, अल्पं = संक्षिप्त (पूर्वापर विरोध से रहित),
लघीयसः = अल्पबुद्धियोकं हितार्थ,।
अन्वयार्थं - मै ग्रन्थकार (माणिकयनन्दि आचार्य) कर्हगा। वह क्या
है? लक्षण। वह लक्षण केसा है? अल्प है - संक्षिप्ते पूर्वापर विरोध
से रहित है, शब्दकी अपेक्षा अल्प है पर अर्थको दुष्टिसे महान है)
वह लक्षण किसके उदेश्यसे कहा जा रहा है? मंदबुद्धि वाले शिष्योंके
उद्देश्स्से कहा जा रहा है। यहाँ किन दो के लक्षण को कहा जा रहा
है? अर्थात् प्रमाण और प्रमाणाभासके। क्योंकि प्रमाणसे जानने योग्य
पदार्थकी सिद्धि होती है ओर प्रमाणाभासये पदार्थकी सम्यक्सिद्धि नही
होती। श्लोके इति शब्द हेतु अर्थम है।
श्लोकार्थं - प्रमाणसे (জবান) अभीष्ट अर्थकी सम्यक् प्रकारसे
सिद्धि होती है ओर प्रमाणाभाससे (मिथ्याज्ञाने) इष्ट अर्थकी सिद्धि
नहीं होती। इसलिए मैं प्रमाण और प्रमाणाभासका पूर्वाचार्य प्रसिद्ध एवं
पूर्वापर दोषसे रहित संक्षिप्त लक्षणको लघु जनों (मंद बुद्धिवालों) के
हितार्थ कहँँगा।
परीक्षामुख 13
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