विवेकानन्द साहित्य जन्मशती संस्करण खंड 2 | Vivekanand Sahitya Janmshati Sanskaran Khand-2

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९३ मनुष्य फा ययाथ स्वरूप लगने से स्मृति-लोप हो जाने पर, वह नष्ट हो जाता भौर हमारा विल्कर खोप हो जाता! बचपन के, पहले दो-तीन वर्षों का मुझे कोई स्मरण नहीं है और यदि स्मृति और अस्तित्व एक है, तो फिर कहना पडेगा कि इन दो-तीन वर्षों मे मेरा अस्तित्व ही नही था। तब तो, मेरे जीवन का जो अश्ञ मुझे स्मरण नही, उस समय मै जीवित ही नही था-- यही कहना पडेगा । यह्‌ वात व्यक्तित्व के वहत सकीणे अर्थ मे है। हम अमी तक व्यक्ति' नही हैं। हम इसी व्यक्तित्व को प्राप्त करने के लिए सघष कर रहे हैं, और वह अनन्त है, वही मनुष्य का प्रकृत स्वरूप है। जिनका जीवन सस्पूर्ण जगत्‌ को व्याप्त किये हुए है, वे ही जीवित हैं, और हम जितना ही अपने जीवन को शरीर आदि छोटे छोटे सान्त पदार्थो मे वद्ध करके रगे, उतना ही हम मृत्यु कौ गोर अग्रसर होगे! जितने क्षण हमारा जीवन समस्त जगत्‌ मे व्याप्त रहता है, दूसरो मे व्याप्त रहता है, उतने ही क्षण हम जीवित रहते हैं। इस क्षुद्र जीवन मे अपने को वद्ध कर रखना तो मृत्यु है और इसी कारण हमे मृत्यु-भय होता है। मृत्यु-मय तो तभी जीता जा सकता है, जब मनुष्य यह समझ ले कि जब तक जगत्‌ मे एक भी जीवन शेष है, तव तक वह भी जीवित है। ऐसे व्यक्तियों को यह उपलब्धि होती है कि मैं सब वस्तुओ मे, सब देहो मे वर्तमान हूँ। सब प्राणियों मे मैं ही वर्तमान हूँ। मैं ही यह जगत्‌ हूँ, सम्पूर्ण जगत्‌ ही मेरा शरीर है! जब तक एक भी परमाणु शेष है, तव तक मेस मृत्यु कहाँ ? कौन कहता है कि मेरी मृत्यु होगी? तब ऐसे व्यक्ति निर्भय हो जाते हैं, तभी यह्‌ निर्मीक अवस्था आती है। सतत परिणामशील छोटी छोटी वस्तुओो मे अविनाकत्व कहना भारी भूछ है। एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक ने कहा है कि आत्मा अनन्त है, इसलिए आत्मा ही व्यक्ति---अविभाज्य' हो सकती है। अनन्त का विभाजन नही किया जा सकता--अनन्त को खण्ड खण्ड नहीं किया जा सकता। वह सदा एक, अविभक्त समष्टिस्वरूप, अनन्त मात्मा ही है भौर वही मनुष्य का ঘঘাঘ व्यक्तित्व' है, वही 'प्रकृत मनुष्य' है। मनुष्य! के नाम से जिसको हम जानते हैं, वह इस “यक्तित्व” को व्यक्त जगत्‌ मे प्रकाशित करने के प्रयत्न का फल मात्र है, क्रमविकास' आत्मा मे नही है। यह जो सव परिवर्तन दो रदा दै-तुरा व्यक्ति मला हो रदा दै, पशु मनुष्य दो रहा है--यह सव कभी आत्मा मे नही दोता। कल्पना करो कि एक परदा मेरे सामने ই जौर उसमे एक छोटा सा छिद्र है, जिसमे त्ते म केवर कु चेहरे देख सकता हूँ। यह छिद्ग जितना वडा होता जाता है, सामने का दृश्य उतना ही अधिक मेरे सम्मुख प्रका- पित होता जाता दै, मौर जव य ভিন पूरे परदे को व्याप्त कर छेता है, तब मैं २-२




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