हिन्दी विश्व कोष भाग 2 | Hindi Vishva Kosh Bhag 2

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Hindi Vishva Kosh Bhag 2  by नगेन्द्र नाथ वाशु - Nagendra Nath Vashu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अंभिश्ने घण--अंभिषिक्त . तरतोब लगाता .-हौ 4 ' ३ शरणापन्न, पनाह पा जाने काबिल | ४ सम्मानित, इज्जं.तदार। ५ प्रदोष; चमकत हुआ । ६ शक्तिशालो, ताकृतवर । अभिश्वेषण (स'० क्लो० ) - बखन, वेध्टन, रज्ज्‌, पढ़े बांधनेको' चिट । अभिष्ठस्‌ (स'० त्वि०.) ऊपर सांस लेनेवाला, जो किसौको तफू सांस चलाता हो । असिश्वास (६० पु* ) उद्गार, उद्गम, उद्गमनः सांसका छोड़ देना 4 अभिशवेत्य (८० त्ि० ) अभि अपगतं ख़ेत्यं खभावस्य शुचित्व' यस्य, -प्राटि-बहुत्रो ° । ` शुदचरित, जिसका खभाव पवित्र रड, नेकचलन, पाकोजा मिजाजवाला। अभिषक्त (स° ` ति° ) दलित, पराजित, अभिशप्त, निन्दित, पायमाल, भिकस्त, जिसको बदहुवा दौःगयो ` षहो, बदनाम | : श्रभिषङ्ग ( स घु० ) अ्रभितः सङ्गो मिलनम्‌ श्रासक्तिवौ येन ; प्रादि-बचुत्रो ०, अभि-सत्ञ-घज्‌। १ शपथ, क्रम | २ आक्रोश, बददुवा। ३ पराक्षव, हार। গলি शपथ खादाक्रोगे पराभवे (বিশ্ব) 8 आसक्ति, फंसाव। धू व्यसन, दुःख, आदत, तकलोफ्‌ । “नवविभ्मामिषद्ञात्‌ 7” (লা এ৫) 'বনামিগয়া नूतनदुःखाम्‌।' ( सहिनाय ) ই মু संयोग, पूरा मैल । ७ सङ्गति, सोबत । ठ भालिङ्गन, छातौसे छातोका प्रेमसे सिलाना। & प्रेतवाधा, ओेतानृका साया । . श्रमिषङ्गज्वर ( सं° पु० ) भूतादिके आवेशसे आया द्रा ज्वर, जो बुद्धार शेतानृके साये सबब चदृता - हो । यद छः प्रकारका होगा । वेदयकमें लिखा हे, “प्रभिघातामिचाराभ्यासमिषद्गभिश्शपतः। श्रागनुर्जायते दोषं $थाखन्त' विभावयेत्‌ ॥” ( माधव निदान ) पुन, “कामशेकभयक्रोपैरभिषक्षख यो ज्वरः । सोइमिषड्ज्वरो 'ह यः यद्व भूतामिषद्रज; 1” ( चरक नि° ) अभिषदड्धा (४० स्तथो० ) वेदका वाक्य विशेष । अभिषव (स' पु० ) अभि-सु-अप्‌ । १ यज्जौय स्नान, सजुहबी गुसल | २ निष्पोड़न, सोमलताका निचोड़। “३ सद्यसन्धांन, आवकारो। . 8 सुरासण्ड, कारोत्तर, ০], या, 4 १२ खमीर। ५ सोमलताका रंखपान । वदिक समयमे ऋषि शकटपर सोमको लाद लाते. थे! उसके वाद वदो लता प्रस्तरपर रख अन्य प्रस्तर दारा दवा देते रहे। श्रच्छो तरह दब जानेसे भैड़के चमड़ेको मसकमें उसे भरते और कूटठ-कूट कर रसं निकालते थे। मसकका रोयेंदार चमड़ा भौतरकों ओर रहता था। पीछे वह्ो रस पुनर्वार चर्मके आधारसे छान लेनेपर परिष्कार होते रहा। ऋषि कुम्भके भोतर रख सोमरसमे यव, चोनो प्रति नानाप्रंकार द्रव्य मिला देती थे। उसमे अन्तरत्सिक्त होकर मदय प्रसुत होते रहा । ख्यते खायते भ्रस्िन्‌, अधिकरणे. प्‌ । ६ यन्न । ७ जेनश्ास्तरके मतसे सौवोरादि द्रव वा हय द्रव्य । दरब इष्यं वा ऽभिषवः। । दवः. सौवौरादिकः इं वा दरव्यमभिषवः इत्यभिघौयते ॥ ( भकलङ्रचित त्वाधैराजवात्तिंक ७।१५।५ } श्रभिवषण ( स क्तो० ) ्रभि-सु-लुयट्‌। भरमिषव ईेखो। श्रभिषवणो ( स० स्नी° ) सोम-निष्योडनका यन्त, जिस चोज,से सोम .दबाया जाये । अभिषवणोय ( स*० त्वि० ) सोमरसको भांति निचोड़ जाने योग्य, जो ख्‌,ब दबाने काबिल हो । अ्रसभिष्य (स« त्ि० ) अमितः सोढ' शकयम्‌, अमि- सच-यतू्‌ । १ सहन करने योग्य, जो बरदाश्त करने काबिल हो। ( अव्य ) र वलपूवैक, कोरसे।! ` भ्रभिषाच्‌ (কব व्रि” ) भ्रभि-सच्‌ सार्थे णिच्‌-किप्‌। सनम ख बन्धन करनेमें संसथे, अभिभावक, सामने वाघ सकनेवाला, जो जड़वत्‌ कर सकता हो | . अभिषावक ( सं° यु° ) सोमरस निचोडनेवाला व्यक्ति । श्रभिषावकोय (खं° ति°). ` अभिषावक-सम्बन्धौय, जा सोम निचोड़नेवाले शख,ससे ताज्लक्‌ रखता हो 1 अभिषाह, अभोषाह्‌ ( स'* त्रि० ) अभि-सह-खि.खा्थे বিন क्षिप्‌ वा। १ शत्रजयकारो, दुश्मन्‌को जोतने- वाला। २ सहनकारो, जो बरदाश्व कर लेता हो। अभिषिक्ष (सं०त्वि०) अभिषिच्वते स्त, अभि-सिच्‌- क्ष। १ विधिपूवक स्रापित, जो मचहजबी तौरपर नहलाया गेया हो । प्रतिमाकौ प्रतिष्ठा और राजोके




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