भारतेन्दु हरिश्चंद्र | Bharatendu Harishchandra
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
17 MB
कुल पष्ठ :
201
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( ५ )करना चाहिए ।› कहते है कि बा० हरिश्चन्द्रजी ने उसी समय
निम्नलिखित दोहा बनाया ।
ले ब्योंड्रा ठाठे भए श्री अनिरुद्ध सुजान ।
बाणासुर की सेन को हतन लगे भगवान ॥
बा० गोपालचन्द्र जी ने बड़े प्रेम से पुत्र के उत्साह को बढ़ाने
के लिये इस दोहे को अपने ग्रंथ में स्थान दिया ओर कहद्दा कि
(तू मेरा नाम बदायेगा + इसी भ्रकार एक दिन बा० गोपालचन्द्र
जी के रचित (कच्छप कथांमृतः क एक सोरटे की व्याख्या उन्हीं
की सभा में हो रही थी। भारतेन्दु जी उसी समय वहों आ
बैठे ओर सब की बातों को सुनते हुए अंत में एकाएक बोल
उठे कि बाबू जी हम अथ बतलाते हैं । आप वा (उस) भगवान
काजस वणेन करना चाहते है, जिसको आपने कछुक छुवा
है अर्थात् जान लिया है? इस नई उक्ति को सुनकर इनके पिता
तथा सभासद्-गण चमत्कृत हो उठे ओर इनकी बहुत प्रशंसा
करने लगे | सोरठे की प्रथम पक्ति यों है-
करन चहत जस चार कछु कछुवा भगवान को ।
इसी प्रकार एक बार जब इनके पिता तपेण कर रहे थे तब
इन्होंने प्रश्न किया था कि “बाबू जी, पानी में पानी डालने से
क्या लाभ ?? धामिक-प्रवर बा० गोपालचन्द्र ने सिर ठोक;
ओर कहा कि जान पड़ता है तू कुन बोरेगाः। बचपन की
साधारण अनुसंघान-का रिणी बुद्धि का यह एक साधारण प्रश्न
था, जो इनके जीवन में बराबर विकसित होती गई थी। यह
धामिक तथा सामाजिक सभी प्रश्नों के तथ्य-निणय में दृत्तचितरहते थे |
भारतेन्दु जी का मुंडन-संस्कार अल्पावस्था ही में हुआ थाओर जब यह तीन वषं के थे तभी इनको कंठी का मंत्र
दिया था । जब इनकी अवस्था नव वषं कीथी तभी सुप्रसिद्ध
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