गल्प कुसुमाकर | Galp Kusumakar 

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : गल्प कुसुमाकर  - Galp Kusumakar 

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about ज्वालाप्रसाद जी जौहरी - Jwala Prasad Ji Jauhari

Add Infomation AboutJwala Prasad Ji Jauhari

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
५ क्षमा प्राथना সর গত हैं। परमात्माको आगे रखकर इस प्रकार अनीति करना कोई इनसे सीख ले। इसीलिये में इस ढगसे परमात्माको नहीं मानता। जिसकी पवित्र समे छोग दिन दहाडे उसीके नामपर डाके डाले और वह सब कुछ जान बूमकर तथा सर्वेशक्तिमान्‌ होकर भी छुछ न कहता हो यह कितनी विचारणीय वात दै 1 ऊधव भडक उटा ओर वोखा कि माधव । जव तू नास्तिक होकर इृ्वरको सवके सामने ईश्वरीय स्यायते न डरकर उसे कोसता दै तव तू मेरा भाई नहीं दुश्मन है। तेरा मुह देखनेसे पाप ख्गता दै । जा अपनी घरवालीको लेकर निकल जा। इस घरमे अब तुमे स्थान न म्टिगा] परमात्मा तुकसे दर-द्रकी खाक छनवायेगा अगर तव तेरी अकर ठिकाने आयेगी । नास्तिक कहीं का । [ २ 1 माधव राजगढ मडीमे मजदूरी करने ख्गा दै । यह २॥ मन की वोरीको उपर फेककर ढाग चिन देता दै । रतको चौकीदारी भी किया करता दै । मगर अभी इसके पास इतनी पूजी नहीं हो पाई है कि जिससे यह ठप्पे छाकर श्रमजीविओंमे से नाम कटाकर अपनी रंगसाजीका काम आरभ कर दे। इसीलियरे हरदेवी रोज कहती है कि--मुझे भी साथ ले चला करो जिससे दुगने ই आने गं | माधव--दहरदेई 1 जदातक जीवित हू तुमे यह ढासी-कर्म न करने दूगा । मेने तेरा हाथ गुलामी करानेके लिये नहीं पकड़ा था। में तुझे स्वर्मकी देवी वनाना चाहता ह। जेसे-लेसे इस




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now