नाम सुमिर मन बावरे | Nam Sumir Man Bawre

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Nam Sumir Man Bawre by आचार्य श्री रजनीश ( ओशो ) - Acharya Shri Rajneesh (OSHO)

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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

ओशो (मूल नाम रजनीश) (जन्मतः चंद्र मोहन जैन, ११ दिसम्बर १९३१ - १९ जनवरी १९९०), जिन्हें क्रमशः भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश, या केवल रजनीश के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय विचारक, धर्मगुरु और रजनीश आंदोलन के प्रणेता-नेता थे। अपने संपूर्ण…अधिक पढ़ें


पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नाम सुमिर मन बावरे पहला प्रवचनतुमसों मन लागों है मोरातुमसों मन लागों है मोरा। हम तुम बैठे रही अटरिया भला बना है जोरा। । सत की सेज विछाय सुति रहि सुख आनेद घनेरा। करता हरता तुमह आहट करौ मै कौन निय ।। रद्यो अजान अब जानि परयो है जव चितयो एक कोग। आवागमन निवारह्‌ सोड[] आदि-अंत का आहिऊं चोर। जगजीवन विनती करि मागे देखत दरस सदा रहो तोरा। । अब निर्वाह किए बनि आइहि लाय प्रीति नहिं तोरिय डोर ।। मन महे जाइ फकीरी करना। रहे एकंत तेत ते लागा राग निर्त नहिं सुनना।। कथा चारचा पदे -सुनै नहि नाहि बहत बक बोलना। ना धिर रहै जह तहं धावै यह मन अह हिंडोलना। । मँ तँ गर्व गुमान विवादंहि सवै दूर यह करना। सीतल दीन रहै मरि अतर गहै नाम कौ सरना । जल पान की करै आस नहि आहै सकल भरमना। जगजीवनदास निहारि निरषिकं गहि रह गुरु की सरना।। भूलु फलु सुख पर नही अवह होहु सचेत। सोंइ[] पठवा तोहि का लावो तेहि ते हेत।। तज्‌ आसा सव जट ही संग साथी नहिं कोय। केउ केह्‌ न उवारिही जेहि पर होय सो होय।। कहवो ते चलि आयह्‌ कहो रहा अस्थान । सो सुधि विसरि गई तोहि अव कस भयसि हेवान। । काया- नगर सोहावना सुख तबहीं पै होय। रमत रै तेहि भीतर दुःख नहीं व्यापै कोय।। मृत-मेडल कोऽ धिर नही आवा सो चलि जाय । -गाफिल हवै फंदा परयौ जहे तहं गयो विलाय ।। एक नई यात्रा पर निकलते हैं आज! बुद्ध का कृष्ण का क्राइस्ट का मार्ग तो राजपथ है।




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