जैन शिला लेख संग्रह : द्वितीयो भाग : | Jain Shila Lekh Sangrah Bhag 2

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जैन शिला लेख संग्रह : द्वितीयो  भाग :  - Jain Shila Lekh Sangrah Bhag 2
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about पंडित विजयमूर्ति - Pandit Vijaymoorti

Add Infomation AboutPandit Vijaymoorti

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१० जन-किरखालेख-संग्रह` [ ५५] सुविहिव श्रम्णोकि निमित्त शाख्त-नेन्रके धारकों, ज्ञानियों और तपोयलसे पुणे ऋषियोंके लिये ( उसके द्वारा) एक संधायन ( एकत्र डोनेका भवन ) बनाया गया । अहेतक्षी समाधि ( निषधा) के निकट, प्रहाड़की ढालपर, बहुत योजनोंसे छाये हुए, और सुन्दर खानोंसे निका- छे हुए पत्थरोंसे, अपनी सिंहप्रस्थी रानी 'शृष्टी” के निमिश षिधामागार--[ ४६] ओर उसने पाटालिकाओमें रज्ञ-जटित सम्भोंको पचचदत्तर राख पणो ( मुद्राओं ) के व्ययसे प्रतिष्ठापित किया । वहै ( इस समय ) मुरिय कालके १६४ यें वर्षको पूर्ण करता है।वह क्षेमराज, वद्धराज, भिक्षराज ओर घर्मराज है ओर कस्याणको देखता रा है, सुनता रहा है ओर अनुभव करता रहा है ।[ १७ ] गुणविरोष-कुशङ, सवे मतोकी पूजा ( सन्मान ) करनेवारा, सवे देवारयोंका संस्कार करानेवाछा, जिसके रथ ओर जिसको सेनाको कमी कोई रोक न सका, जिसका चक्र (सेना) घक्रधुर ( सेना-पति ) कै द्वारा सुरक्षित रहता है, जिसका चक्र प्रवृत्त हे ओर जो राजर्पिवंश-कुछमें उत्पन्न हुआ है, ऐसा मद्दाविजयी राजा श्रीखारवेल है ।इस शिछालेखकी प्रसिद्ध घटनाओंका तिथिपत्र--थी. सी. ( ईसाके पूर्व )9 १४६० ( लगभग ) ... केतुभव्‌७ ०४६९० ( ऊगभग ) ... कलिंगमें नन्‍्द्शास्रन» [२३० ... अश्योककी रूत्यु ]» २२० ( छगभग ) .-. कालिंगके तृतीय-रोजवेश- का स्थापन]ॐ ¶१७ अ »** खारवेखका जन्मऋ { #द८ ०८ ,.. मोय॑वंशका अन्त ओर पुष्यमित्रका राज्य प्राप्त करना ]+ शरः ५०० ५ खारबेरुका युवराज होनाॐ [ १८० ( कगमग .** सावकर्णि प्रथमका राज्य- प्रारम्भ ]




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now