जैनहितैषी [भाग ५] [प्रथम अंक] [कार्तिक श्री वीरनिर्वाण संवत् २४३५] | Jain Hitaishi [Part 5] [No. 1] [Kartik Shri Veernirvan Samvat 2435]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० हो गये हैं, परन्तु किसीने भी एक दूसरेका उल्लेख नहीं किया है । पाठ कोंको मालम होगा कि, शुभचन्द्राचार्य धाराधीश भोजके समयमें हुए हैं, जो कि वि० सं० १०७८ में राज्यके अधिकारी हुए थे, तथा भगवद्भुणभद्द- सूरिने उत्तरपुराण बि० संवत्‌ ९५५ में पूर्ण किया था। पूर्वके विद्वा- नोके ग्रन्थोंमें परस्परका उल्लेख न रहनेका कारण एक तो यह प्रतीत होता है कि, देशभेदके कारण उनका साक्षात आय: बहुत कम होता था, दूसरे उनकी कीर्तिके कारणभूत प्रन्थोंका प्रचार दूर देशोमें तत्काल न हो सकनेसे वे अपनी जीवित्तावस्थामे प्रसिद्ध भी नही हयो पाते थे । इसके सिवाय प्रन्‍्धोंकी प्रशस्तियोंमें वे अपना और अपनी थोडी सी गुरुपरम्पराका परिचय मात्र देना बस समझते थे । आजकलके पुस्तक बनानेबालोंके समान आडम्बर बनाना उन्हें नहीं आता था। कीर्तिकी उन्हें आकांक्षा भी नहीं थी । हमारे यद्धां ऐसे सैकड़ों बडे २ गन्थ हैं, जिनके कत्ताओंका कुछ भी पता नहीं है । श्रीअमितगति सुनिका ग्रहस्थावस्थाका क्या नाम था, वे किस कुलमें तथा किस नगरमे उत्पन्न हुए थे, इन बातोंका कुछ भी पता नहीं लगता है, परंतु उनके ग्रन्थोंसे उनके मुनिकुलका भली भांति परिचय मिल जाता है, यह एक संतो- घकी बात है । अपने तीनोंदी ग्रन्थोंमें उन्होंने अपनी गुरुपरम्पराका उल्लेख क्रिया दै । जिसमेसे यहां हम धर्मपरीक्षाकी प्रदास्तिके कुछ शोक उदधृत करते सिद्धान्तपाथोनिधिपारगामी अभ्रीवीरसेनो 5जनि सूरिवय्येः । श्रीमाधुराणां यमिनां वरिष्ठः कषायधिध्वंसविधौ परिष्ठः ॥ १॥ ` ध्वस्ताशेषध्वान्तदृत्तिमेंहस्वी तस्मात्सूरिदेवसेनो5जनिष्टः । लोकोद्योती पू्वेशैलादिवाक्कः शिष्टाभीष्ठः स्थेयसो 5पास्तदोषः ॥ ९ ॥ भासिताखिलपदा थैसमू हो निमेलो ऽमतिगतिभेणनाथः । १ उत्तर ए राण बननेके कु दही वर्ष पहले भगवाजिनसेन विमान ये ।




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