त्रमबद्धपर्याय | Trambaddhprayay

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Trambaddhprayay by डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल - Dr. Hukamchand Bharill

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपेक्षा रखते हैं। वेसे यह अभी झ्ात्मघ्म में सम्पादकीय के रूप में प्रकाशित हो ही रहा है, बाद में इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करने को योजना है। जैसाकि पहिले निवेदत किया गया था -- हम विश्वास दिलाते ह कि पुस्तकाकार प्रकाशन के पूवे प्राप्त सु्ावो पर गमीरता- पृर्वेक विचार कर आवश्यक संशोधन, परिवद्धन अवश्य किये जावेंगे ।” आत्मघर्म के पाठकों से भी अनेक पतर प्राप्त हुए । सबको घ्यान मे रखते हुए इसे विस्तार दिया गया। चूकि इस विषय को इस युग मे पृज्य श्री कानजी स्वामी ने उठाया था -- श्रतः उनके ताजे विचार भी पाठको तक पहुँचें- इस भावना से उनसे इस सन्दर्भ मे एक इन्टरव्यू भी लिया गया, जो कि हिन्दी झत्मधमं के सितम्बर, १६७६ के रक मे प्रकाशित हो चुका है । इस प्रकार फरवरी, १६७६ से सितम्बर, १६७९ तक लगातार हिन्दी श्रात्मघमं मे सम्पादकीयों के रूप में यह महानिबध प्रकाशित होता रहा जो कि म्रात्मधमं (साइज २०८ ३०/८) मे तब तक लगभग ५० पृष्ठो काहो चुका था!“ इसके बाद म्रक्ट्ूबर, १६७६ के हिन्दी आत्मधर्म मे अपनी बात' शीर्षक से इसके सम्बन्ध मे एक सपादकीय लिखा गया । इसे सर्वांग बनाने के उदेश्य से उसमे भी जिज्ञासु पाठको एव सम्माननीय विद्धानो से माग-दशेन चाहा गया श्रौर उन्हे विश्वास दिलाया गयाकि प्रकाशन से पूवं प्राप्त सावो, सूचनाग्रो पर मभीरतापूवेक विचार केर आवश्यक सशोघन, परिवतेन, परिवद्धेन, स्पष्टीकरण श्रवष्य किए जावेगे, इस महानिवघ के परिमार्जन मे उनके सुभावों का भरपूर उपयोग किया जावेगा । इन सम्पूर्ण आग्रह-अनुरोधो से जो कुछ भी प्राप्त हुआ, उसमे प्रोत्साहन रौर प्रशसा ही अधिक थी, सुकाव और सलाह कम । फिर भी बार-बार किये गये झअनुरोधो के फलस्वरूप जो भी मागं-दर्शन मिला, उसका दिल खोलकर लाभ लिया गया है। जो भो प्रश्न प्राप्त हुए उन्हे प्रश्नोत्तरो के रूप मे स्पष्ट करने का प्रयास किया है । बहुत से सम्भावित प्रश्न स्वयं उठा-उठाकर समाधान करने का प्रयत्न किया है । इसप्रकार इस ग्रथ के दो खण्ड हो गए हैं - १ ऋरमबद्धपर्याय एक झनुशीलन २ क्रमबद्धपर्याय कुछ प्रश्नोत्तर ( १५ )




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