शरत् साहित्य [भाग 24] | Sharat Sahitya [Bhag 24]

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : शरत् साहित्य [भाग 24] - Sharat Sahitya [Bhag 24]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
जागरण १७ चिन्तित मुखमुद्रामें साइहबने कद्दा--ये जो कलकत्तेसे आकर गाँव-गाँवमें रात्रि- पाठ्शालायें खोले बठे हैँ । रेयतों-कमकरोंकी बातें लिखकर मुझसे आदेश मोगा था--तो इसमें हज ही क्या ? जो मर्जी आए, करें वे छोग मेरा क्या सुनने तो वस अपनी मालशुजारी-भर चाहिये। आहेख्यने पूछा--तो, हमारे मौजेमें मी राजिपाठभाला खोली गई है ! ८४ अवश्य | ” पिता सगवे वोले, '* अवश्य ! मैंने ख़ुद ही तो उन्हें लिखा था, कि मन्दिरका नाथ्यमवन खारी पड़ा रहता है, चाहें तो उसीमें काप् चलावें। किरासीनका ही तो खर्चा छंगेगा न १ ”? आलेख्यने कहा--सो, मिद्टीका वह तेल भी कचदरीसे ही दिया जाता है १? ५ हुक्म तो दिया है, अब अगर न मिलता हो तो यदि क्या कर | ` वह कुछ देर तक चुप रही, बापकी ओर देखती रही फिर वोखी--वावा, उस कमरेमें जाकर तुम बैठो । में यह सब ठीक कर लेती हूँ। तुम्हारे साथ में भरी जाऊँगी | विस्मित स्व॒रमें रे साहबने कद्दा--तुम चलोगी ? “८ हूँ ?...आहछेख्यने जवाव दिया--“ लगता है मेरे गये बिना काम नहीं चलनेका । ”? र्‌ यह पहला अवमर था कि आहेख्य पिताके साथ अपने पूर्वजोंके निवासगहमें आ उपस्थित हुई । उम्र ज्यादा नहीं थी लेकिन अवतक तीन वार वह युरोप हो आई थी ! दाजजिरखिग ओर सिमला तो श्चायद्‌ ही किप्री साल टता होगा) चायपार्टी और डिनर--वेशुमार दावतोंमें वह शामिल हो चुकी है। जब माँ जिन्दा थी, तब ख़ुद अपने यहाँ भी दावतोंके त्रुटिहीन आयोजन दाथ वराया है आलेख्यने । समाजोचित सभी आवश्यक वातोंका उसे ज्ञान है। गाना-बजाना, दौड-धूप, खेल, समा-सोसाइटीके त्तौर-तरी के सब उसे माप हैं । कहाँ, कब, कैसी पोशाक जहरी है; कौन रग और कौन-सा फूल किस मौसमसे मैच खाता है, इसकी उसे भली-भौति जानकारी थी। अभिरुचि और फेशनके सम्बन्धमें मालम करनेको उसके लिए शायद ही कुछ वच रहा हो । हो नदी माकम दै तो वस एक यही वात कि ये चीजें आखिर आती कहाँसे हैं और किस तरह । माँ और बेटी र्‌




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now