महाकवि भास : एक अध्ययन | Mahakavi Bhaas : Ek Adhyyan

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Mahakavi Bhaas : Ek Adhyyan by बलदेव उपाध्याय - Baldev Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विपय-अवेश ९ (१) इन समस्त नाठडों में ( केवल चादुदत्त को छोडकर ) नान्दी के अनन्तर सूतधार मुंगलपाठ से इनका आरम्म करता है 1१ (२) अंकों के मध्य में लघुविस्तारी प्रवेश्कों तया विष्कम्मकों का प्रयोग स्या गया है। इनका उपयोग दर्शकों को श्रं के मध्य में घटित घटनाओं की सूचना देने के लिए. किया गया है 1 (३ ) इन नाद्ों में 'प्रस्तावना? के स्थान पर सतत हरयापना! का प्रवोग “क्या गया है। (४ ) समी नाठकों में, जिनमें कि मस्तवाक्य है (चारुदत तथा दूत- घटोत्कच मे मरतवा्य नदीं ट) यद कामना पि राजा चिते जि राजते कहागया है तथा जो दिमालय से विन्ध्य तथा पूर्व सागर से पश्चिम सागर तऊ शासन करता है, सम्पूर्ण पृथ्वी की विजय करे; समी वर्णों के धर्म की रहा हो तथा गी एवं मले मनुष्यों की रक्षा हो ।* (५ ) सामान्यतया मस्त प्रतिपादित नास्व-नियमों का इन नायो न पालन नहीं हुआ हे। मृत्यु तथा लढाई मग्डे, रद्नमश्च प्र ही प्रदर्शित डिये गये हैं तथा श्रमिपेक, पूछा, शपय या अशु प्रज्ालन ॐ लिये सङ्गम पर छल लाया गया दै। जैसे--प्रतिमा? में दशरथ की, “श्रमिप्रेक' में चालि की तथा 'ऊर्मह्न! में दुयोपन की मृत्यु रद्धमश्य पर ही दर्शायी गयी चाणर, मुष्टिक ओर कंस का वधमी प्रेज्षरों को र्ममज्च पर ही दिखायी पठता है। बालचरित में इृष्ण और अ्ररिष्ट के मयकर युद्ध का वणन है! स्वप्ननाटक में क्रीडा और शयन मी दिखाये गये हैं. श्रयच दूर से उच्च स्पर मे पुकारने फा वर्णन मंध्यमत्यायोग चया पञ्चरात्र में है । १. (र) नान्वन्ते ततः प्रविशति सूत्रचारः 1 सूनधारः-उदयनवरेन्दु- यणाः“ ख खप्ननारक्- (य) नान्वन्ते वतः प्रविशति सूप्रवारः । सूउघारः--पाठु वासवदत्तायो ” * प्रतिशायी० ! दर्यादि 1 २. इम! खागरपयन्ता दिमवदूषिन्ध्यडरुडलछाम्‌ मष्टमेष्टावपत्राह्ा यजिः थासु नः॥ स्वप्न० ६-१६; तया शम्य नाटकों के मरतवाक्य 1




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