नागरीप्रचारिणी पत्रिका (१९६७) नॉ. २ ऐसी ४३२३ | Nagri Pracharini Patrika (1967) No 2 Ac 4323

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Nagri Pracharini Patrika (1967) No 2 Ac 4323 by संपूर्णानंद - Sampurnanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१०८ नागरीप्रचारिणी पिका तरह आशुवोध न होकर प्रश्नमुखर था ओर शान राशौभूत न होने के कारण उसकी इश्टि उसपर सकेंद्रितन होकर भ्रमणशील थी, निरतर शंकायुक्त खोज मे प्रबृत्त रहती थौ । उसका श्रक्राशवत्‌ रिक्त ओवन अपने उद्गौरित गायन को आकाश में बारबभार पारायण के द्वारा सरक्षित करने में सफल हुआ | पर यह जीवन की निरततर बदलती जाती परिस्थितियों में कायम रहना समब न था। नित्य नवीन उपलब्धियों से भ्ो ननजीवन भर चला तो स्मृति में नए. और पुराने का एक जगल उग आया और यह सभव न था कि अन्न के व्यस्त जीवन मे पहले की भाँति सादिष्यकी थाती स्पृृति में संमालकर रखी जा सके। उसका न केवल वर्त हो जाना बलिक सर्वथा ब्रिजुत्त हो जाना स्वाभाविक था जब तक कि कोई ऐसा उपाय मनुष्य न कर ले জিএন द्वारा साहित्य श्रादि का श्रपना प्राचीन वैभव सुरक्षित कर वह नए. कार्यों में सलग्म दो सके । बह उपाय मनुध्य ने द्वेंढ़ा और पाया और उसे उसने 'लिपि! में कहा । इस लिपि भ्रथवा लिखावट में उसने भाषा को प्रतीकतः साथा और प्रतीक कालातर में भ्रक्तषर श्रथतरा वर्ण बन गए.। और, उस प्रतीक तथा अक्षर अ्रथवा वर्ण के बीच का कालप्रसार असाधारण बड़ा था। किन परिध्वतियों म मानव जाति क॑ किस समुदाय ने क्रिस देश में लिपि का श्राविष्कार किपा इसका कोई सष्टी विवग्ण उपलब्ध नहीं है, उसके समुदय का मात्र अटकल लगाया जा सकता है। पर इसमें सदेह नहीं कि प्रारभिक लिपि प्रतीकात्यक थी और उसके प्रतीक चित्र थे। लिपि के अ्रमभ्युदय का रूप प्रथमत' चित्राव्मक था | उसके तीन असाधारण डदाइरण लिपि के इतिहास मं झाज उपलब्ध ५ -- १ - भिल्ली चिर्रालपि, २ - ননী चित्रलिपि, रे - मायन चित्रलिपि | मेक्सिको पेर, मय श्रादि के इका आदि छामरीकी दृडियनों की लिपि भी चिंत्रलियि ही है। उसका व्यवह्ा र उनकी छीजती क्षल्या की ही माँति निरतर घय्ता जा रहा है। वह लिपि श्रत्यत प्राचीन भी न्ष, इंसा के बाद है उसका उदय हुआ है, तब तक अनेक चित्रलिपियाँ अपने स्वरादि मेद के संयुक्त वर्शमाला की स्थिति तक पहुंच चुकी थीं और इससे प्रकट है कि वह सभ्यता अ्रमेरिका में, अपने विविध रचिर भग्नाव्शेर्षों के बावजूद, याजत्रिक रुम्यता के चिकित मागं पर विशेष न चल सकी । चीनी लिपि शझ्राज भी चित्रात्मम है और उस साधाग्ण विचार और विश्वास को भलत प्रमाणित करने में सहज समथ है कि चित्रलिपि मे पेचीदा विचार अथवा समुन्नत साहित्य की ग्रमिव्यक्ति नहीं हो सकती | इस स-घ में यहाँ अ्रतत, कुछ न कहकर हम इन्यत्र कहेंगे जिसके दृद्वात्मक कारण से ही यह समत्र हो सका है | मिली चित्रलिपि एक ऐसी लिखाबट है जिसमे श्रारम के चित्र प्रतीको से लेकर बर्माला के आविष्कार की अवधि तक की समस्त मजिलों का समावेश प्रस्तुत




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