रघुवंश | Raghuvansha
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
339
श्रेणी :
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देवीरत्न अवस्थी - Deviratn Awasthi
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अथम सरतुल्य नेत्र मभुगों को वे,दोनो ही देखते चले।
पास ही लीक छोड़े जो,रथ को थे निहारते 1[४०॥देखते सारसों को चे,मुख दोनों उठा-उठा |
तोरणें स्तम्महीना-सी,बोलती पंक्ति बाँध जो ॥४१॥प्राथना सिद्धि की द्री,अनुकूला समीर थी |
केशा पाग ने द्भ पाई,टापों से बलि जो उड़ी ॥४रा।पञ्च गनध तड़ामों की,वीचि विक्षोभ शीतखा।
अपनी साँस -सी सोंधी,दोनों को प्राप्त हो रही ॥४३॥पुण्य दान उन्हीं कै ये,युप सम्पन्न ग्राम थे।
सफला साध्यं आश्वीषें,जहाँ के विप्र दे रहै ॥४५]]
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