रघुवंश | Raghuvansha

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Raghuvansha by कालिदास - Kalidas

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

कालिदास - Kalidas

No Information available about कालिदास - Kalidas

Add Infomation AboutKalidas

देवीरत्न अवस्थी - Deviratn Awasthi

No Information available about देवीरत्न अवस्थी - Deviratn Awasthi

Add Infomation AboutDeviratn Awasthi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
अथम सर तुल्य नेत्र मभुगों को वे, दोनो ही देखते चले। पास ही लीक छोड़े जो, रथ को थे निहारते 1[४०॥ देखते सारसों को चे, मुख दोनों उठा-उठा | तोरणें स्तम्महीना-सी, बोलती पंक्ति बाँध जो ॥४१॥ प्राथना सिद्धि की द्री, अनुकूला समीर थी | केशा पाग ने द्भ पाई, टापों से बलि जो उड़ी ॥४रा। पञ्च गनध तड़ामों की, वीचि विक्षोभ शीतखा। अपनी साँस -सी सोंधी, दोनों को प्राप्त हो रही ॥४३॥ पुण्य दान उन्हीं कै ये, युप सम्पन्न ग्राम थे। सफला साध्यं आश्वीषें, जहाँ के विप्र दे रहै ॥४५]]




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now