बचपन का फेर | Bachapan Ka Pher

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Book Image : बचपन का फेर  - Bachapan Ka Pher
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२२ पचपनका फरखेती करो, हल चलाओ ! स्वय भी सुख भोगोगे, देदको भी लाभ होगा । आजकल जितना पैसा जमीन पैदा कर रही है और किसी काममे नहीं मिलेगा | में सच कहता हूँ कि यदि मैने श्रपना पैसा इधर-उधर न फंसाया होता तोम तो खेतीही करता । नन्दा-- यह वानप्रस्थ भ्राश्रमकी बेकार जिन्दगीसे तो हजार दर्ज श्रच्छा रहेगा ।हरगोपाल--नही, भई, यह मुझसे न होगा । सारा दिन आकाशकी ओर देखते रहो कि कब वर्षा हो और कब खेतोमे बीज उगे । मेने तो निश्चय कर लिया है कि एकान्तम बैठ कर गीता, वेद तथाउपनिषदोका श्रघ्ययन करूगा । ५ चोपडा- [ घड़ी देख कर व्यंग्यससे | ्रच्छा तो, सन्यासीजी, प्रणाम । अब हमे आज्ञा दीजिए ।हरगोपाल---बैठो न, जल्दी লঘা ই ?चोपड़ा-- भई, श्रभी स्नान श्रादि करना है, फिर समाज जागा ।नन्दा-- आजके अखबारमे एक विज्ञापन है। में तो उसके लिए अरज़ी भेजना चाहता हूँ। छोटे-छोटे बच्चे है, में तो सनन्‍्यासका विचार भी नही कर सकता ।[ दोनों उठकर चल देते हे |हरगोपाल--कमला ! कमला !कमला-- [ अन्दर ही से | सामान बाँध रही हूँ ।'हरगोपाल--थोड़ी देरके लिए छोड दो । जरा इधर आझो, जरूरी काम है ।| कमला आती है ]कसला-- कहो, अब क्‍या सूझी ?हरगोपाल---देखो, व्यग्य करना छोड दो । मेरी सलाह है कि तुम लोग तो चलो दरियागज और मे जाता हूँ देहरादून | वहाँ दस पदरह




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