श्रीरामकृष्ण शिवानन्द स्मृतिग्रन्थमाला | Shree Ramkrishna Shivanand Smritigranthmala

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Shree Ramkrishna Shivanand Smritigranthmala by रामगोपाल गिरधारीलाल - Ramgopal Girdharilal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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# हे श्रीरामकृप्ण की चेदान्तसाधघना श छित करते थे ओर उसके समीप इृद आसन जमाकर अपने निवात- निष्कम्प-प्रदीप के समान मन को गम्भीर समाधि में निमय् कर देते थे। दिन में भी वे बहुत सा समय '्यान-वारणा में विताते थे, पर उनका वह ध्यान साधारण लोगों की समझ में आते योग्य नहीं होता था; क्योंकि वे उस समय वल्न से अपने सारे झारीर को ढांकबर धूनी के समीप सोते से दिखाई देते थे । देखने वाले छोग समझते थे कि तोता+- पुरीजी सोये हुए हैं. । एक छोटा, 'एक छम्तरा चिमठा और एक आसन यही श्री तोता- पुरी का सामान था | वे एक लम्वी चोड़ी चादर से अपने दारीर को सदा उपेटे रहते थे। अपने लोटे और चिमटे को रोज धघिसकर मॉजिति थे और चमझीढा बनाए रखते थे । उन्हें रोज अपना बहुत सा समय ध्यान में विताते देख श्रीरामहूप्ण ने एक दिन उनसे पूछा कि-''आप को तो, ब्रह्मज्ञान हो गया है, आप तो सिद्ध हो चुके हैं, फिर आप को इत तरह प्रतिदिन ध्पानाम्यात की क्या आवश्यकता है £ ” तोता- पुरी गभ्मीरतापृत्रेकन श्रीरा मकृप्ण की ओर देखते हुए बोले, “' देख, मेरे इस छोटे की भोर | देखा यह कैसा चमक रहा है। और यदि में इसे रोज न मंजू तो क्या होगा £ तत्र क्या यह तिना मैठछा हुए रहेगा ! मन की भी ठीक यही ढ्या है। ध्यानाभ्यास द्वारा मन को भी यदि प्रतिदिन इसी प्रकार मॉजि घोकर स्वच्छ न करो तो वह भी मठिन हो जाता है । ” तीक्णवुद्धि श्रीरामकृष्ण ने अपने गुरु का यह उत्तर खुन- कर पुन: पूछा--“' परन्तु यदि छोटा सोने का हो तर तो रोज बिना मैंजि भी चह स््च्छ रदेगा १ ” तोतापुरी हँसते हुए वोले, “हों, यंह तो सच है। ” ध्यानाम्यास की आवइ्यकता की यह बात श्रीरामकृप्ण




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