इतिहास समीक्षा [अंक २] | Itihas Samiksha [Ank 2]

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : इतिहास समीक्षा [अंक २] - Itihas Samiksha [Ank 2]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about विभिन्न लेखक - Various Authors

Add Infomation AboutVarious Authors

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
फनिप्क की तिथि १५७ सम्मवत पकनसम्यद ही है भौर फौगाम्यी पर कनिष्क फाप्रधिकार कनिष्य- मम्वत्‌ मेषी पाधौरम्पोषहाग प्रयुमत सम्पद्‌ उनफा प्रपना रम्बत्‌ नही चा इसलिए निप्यपं निकलता है कि मपो हारा प्रयुक्त सम्यन्‌ (जो घनः सम्यत्‌ नगता र} परीर फनिष्र-सम्यत्‌ प्रभिन्ने पे । ए० के० नारापस ने भपने ले मे (पृ० २०६-२३६), जो सप्रो्तन मे मूत्त लेप के रुप में पदा गया पा, कनिष्के क राज्यारोटे फी तिपि १०३ ई० मुभा है । उनण्ठ कहना है कि कपिप्क का -ज्यारोटा १२० से १४४६० तफ़ फनी रखने ये प्रितीय वासुदेय को २७५ ई० में रराना पढ़ता है जिससे उसके भौर समुद्र गुप्त के चीन फेवन छ५ थर्ष का भन्तर रह जाता है जा थदुत कम है । प्रसरे, उस प्रवस्पा में रद्रदामा का ६१५० ई० में मिर्प पर घपिकार भव्यार्येय हो जाता है । दूसरी तरफ, प्रगर हम परनिष्क का राय्यरोरण ७८ ई० में मानते हैं तो नफन-यापुव नरेगों भौर गनिए ये बीच दिस थे लिए रधाए सिपाउगा मुश्िस हो जाता है 1 द्म पलिताः दे सारर सारापग्ग सपिपन्सस्पतू की तिथि ६८ ई० घौर १४४ इं० के यो मे कभी रपया पाते हैं कमे प्रणिन मनोर पिष्द वह्‌ भोर वदुतमी धावत्तिया उठते ट । एक, णदमम्य्‌ फो स्पापगा किमी बूपाणा मरेश के द्वारा मनिनाभठिनिै कपोगि दुषासा ष्फ साधीय नहीं थे । दो, बलिप्क का छ८ एं० मे र्गते पर पो-नियाधो पी पटिभान प्रथम पासुदेय से परत भी कठिन रहता है धौर द्वितीय बामुरेवरे प । सीन, पिघसा के सत को मानने मे चिमधोर काचक थीच में काफी यटा धन्सराय रह जाता है। एस सोटर मेगस में नहीं भरा गा मना कयोिः पटू मम्मवत' दृर्नमे पिन या । पियगां था मा इस पूर्पाग्रहू पर पारयाति ङि द्रम कत विताय प्रपमनापरू में हाथी रे इं० के बाद हुमा भौर उस समप यहा प्रथम यायुदेष पना फर रहा था । परन्तु प्रथम थासुदेव फे जिन भ्राठ सिफकों के झापार पर यह निष्कर्ष शिकला याट र पिरणगां मे कभी प्रकाशित नहीं किया । फिर, 'वेप्राम के से प्रथम यायुदेष फे उत्तराधिकारिपो केः मिवे मिलते हैं जो सासानो प्रमाव से एकदम घने हैं । याए प्रसम्मव था भगर प्रथम शापुर ने 'बिम्राम २ को जीत निया होना । कुपाण-गासासीनमुद्रामाता पर भी प्रथम वासुश्य के सिषों फा नहीं बरनू द्वितीय वासुदेव के पिमो का प्रभाव मिलता है । ये त्थ्य वदा यूपा सत्ता के सैरम्तय या प्रमाण है । इसलिए किसी मामानी नरेणने श्रगर करुपाण सत्ता का उन्मुनन किया था सो उसफा शिकार वासुदेम रहा होगा न कि प्रथम वायुदेव । परन्तु दया प्रथम शापुर ने बैग्राम को सचमुच ही ध्यस्त पिया था * यहा यह समरणीय है फि 'बिप्राम २ या 'वेग्राम ३' से शापुर थी. फिसी भी सासाएी नरेश की मुद्राए नहीं मिलती । यह सही है कि 'वेग्नाम र' बौर सैग्राम दे के बीच रास की एक हल्की परत मिली धी, परन्तु इसका कारण प्रथम शापुर द्वारा लगाई गई श्राग ही थी यह प्रमाणित नहीं किया जा सका हैं । दस रास के साथ हथियार धादि न मिलने से लगता हैं कि यह प्राकृ-




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now