जैन धर्म क्या कहता है भाग - 5 | Jain Dharam Kya Kahata He Bhag 5

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जैन घने १९उनका भी आादर कियां जाठा है। लगमछ दो हजार वर्षकी आचार्य-परम्परामें जैन-आाचायोनि' विपुल साहित्यका निर्माण किया है । अनदशन ति 'सन्मम संसारको, जगतुको अनादि-अनन्त माना जाता है जिनी मानते हैं कि इस जगयुका बनानेवासा कोईहीं। वे 'जिन' या. 'अटत'बो ही परमात्मा मानते हैं बौर महूभी कि प्रत्येक आात्मा परमात्मा हो सकता है । ईश्वर नामकी कोई ऐसी शक्ति नहीं है, यो सुष्टिया संचाठन परे. । छह दब्य- शिद्वान्तें बनुसार सृष्टि थनादि-निधन है। 'अनेकांतलैनदर्मनका सब ऊंचा सिद्धान्त है, बनेकान्त । 'अने- कान्तिः कट्ते ह, एफ चीजरा यनेक धर्मात्मक होना । सिनन-मिष दृष्टम जव हम देखने हैं, ठो एक ही चीज लनेक धर्मात्मक दिखाई पड़ठी है। एक दृष्टिसे एक चीज संदु मानी जा सकती है, दूलरी धष्टिसे वही असदू । , बनेकाठमें समस्त विरो समन्वय हो जाता ह! ¢ पि ५जैसे, देवदत्त विसीका बेटा है तो क्िंसीका वापर ।.किमीक्रा भाई है तो किसीका मतीजा । किसीका मित्र है तो विसीका चुप । एक ही देवदततके अनेक रूप हैं । , कोई उसे किसी ख्ये देखता है,'कोई किसी स्पमें 1 स्विच कोर्ट एक, ही.स्य, , सही है, ऐसा कहना ठीक 1 र




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