डॉ जाकिर हुसैन एक जीवनी | Dr. Jakir Husain Ek Jivni
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
282
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रारंभिक वपं परफिदा हुसेन खां ने अन्य पठान नवयुवकों कौ भानि अगरह-उन्नीस साल की
उम्र में ही अपनी शादी नहीं को - यह चात उनके चरित्र की विशेषता की ही
द्योतक है + औरंगावाद में वकालत का पेशा अख्तियार कर लेने पर ही, तेईस साल
की उम्र में, उन्होंने शादी की । उनकी पत्नी नाज़नीन वेगम की बडी लालसा थी
कि उनके कोई बेटी हो, जो एक असाधारण-सी ही वात थी; लेकिन उनके नसीव
में सिफं बेटे ही बेटे लिखे थे, और दे भी सात-सात । इनमे सबसे बड़े थे मुजपफर
हुसैन जिनका जन्म 1893 में हुआ । लगता हूँ कि उनका व्यक्तित्व सौम्य मौर
संतुलित रहा होगा, और अपने भाइयों के आपसी झगड़ो को निपटाने और उनके
वीच शाति और सदुभावना बढाने की विलक्षण क्षमता भी उनमें रही होगी ।
दुर्भाग्यवया उनका अत हैंदरावाद में एक उज्म्वल भविष्य का आरभ होने के पूर्व
हीक्षय रोग से हो गया और वह अपने पीछे दो वेटे और एक बेटी छोड़ गए । दूसरे
लड़के थे आदिद हुसैन , वह भी अलीगढ़ में अपनी पढ़ाई पूरी करने से पहले ही
क्षय रोग से चल दसे । डा जाकिर हुसैन तीसरे बेटे थे । चौथे बेटे जाहिद हुसैन
और पाचवें जाफर हुसैन भी भरी जवानी में इसी वीमारी के शिकार हो गए।
इन भाइयों में से छठे और सातवें, डा. मूसुफ हुसैन और डा. महमूद हुसैन अभी
भी मौजूद हैं थोर प्रत्तिष्ठित पदों पर हैं।
नाजनीन वेगम को नजर लगने का इतना डर वना रहता था कि अपने बेटों
की संध्या वह कभी अपनी जवान पर नहीं लाती थी । सभवत: इसी डर की वजह
से उनके जन्मों की सह्टी ढग से रजिस्ट्री नहीं कराई गई मौर म उनके जन्मदिन
ही मनाए जाते थे । इसी के फलस्वरूप डा. जाविर हुसैन की जन्मतिथि के बारे
में अनिश्चितता बनी रह गई। इटावा के इस्लामिया हाई स्कूल के रजिस्टर से,
जहा कि वह पहलेपहल दाखिल हुए थे, यह पता चलता हे कि दाखिले के दिन,
8 दिसवर, 1907 को, वह दस साल एक महीने के थे। स्कूलों के इंस्पेक्टर एफ.
जी. मोसें द्वारा चार साल बाद इसे काट दिया गया, और उसकी जगह जो
तारीख दर्जे की गई उसके मनुसार उनकी उम्र दस महीने वद्द गई। यह संशोधन
क्यों किया गया, इसकी कोई वजह नहीं दिखाई गई है। हो सकता है कि ये दस
महीने उनकी उम्र मे इसलिये वढाए गए हो ताकि प्रवेशिका (मंट्रिक) परीक्षा के
लिये आवश्यक न्यूनतम अवस्था से उसका मेल व्टिया जा सके; या पहले दर्जे
कराई गई उनकी उम्र में सचमुद ही गलती रह गई थी। 1922 में जब
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