भगवद्गीता [प्रथम अध्याय] | Bhgwadgita [Pratham Adhyay]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( झ हे संमय नी था लव मे मैं था ने तुम थे, न पिसा कोई समय ` था लव ये राना लोग ने थे पीर न आगासि ऐसा कोई समय छोगा जघ हम लोग ने होंगे | इस टेए में रघनेवालि फो समरे दुनार योवयन श्योर छरा धव्या भ्ाप्त ोती है उषो प्रकार उको दुखरा गरोर भो मिले जाता ई । धन्द्ियां शरीरः उनके चिपयों से परश्पर संयोग से सुख दुःख श्वादः क्ता जान ्टोता रे चीर पै अनित्य ईखनकी उत्पत्ति श्वीर स्तय इा लो करती ईद उनका विचकार तुम को करना व्यर्थ है । लिस को इन से व्यया नकीं होती उस घोर पुरुष को सख भौर दुः समान रु शरीर वषो अमरत्व क्तेः भास ष्टोताडे। देसी जो पदार्थ खत है धर्थात्‌ जिसमें सत्य है उसयार नाथ नछीं हो सका और लो असत दे ध्र्यातू लिसमें फु सत्व नदीं उसकी स्थिति नदीं हो श्त । तत्व घानियों ने इस विषय को अच्छी सोति सिच कियाद) यद्र ब्रह्माण्ड जिससे व्याप्त 8 उसन्सो-अविनाणीो लानो ,उसका कोई किसी प्रकार नाण नद्धं कर सक्ता! डे र्युन १ शरीर के भीतर रघमेवासा लोव नित्य, श्रविनाभी गौर अप्रमेय है किन्तु यदद देह उसका अन्तवन्त है अतएव सम युद्ध करो । जी इसे को मारंनेवाला समभत हैं और लो इस को सरमेवाला समझते हैं दोनों सूलते हैं, न यह सारता है न.मारा जाता है -इचका' न नस्म 'छोता इ थे




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