चित्रमय अनुकम्पा-विचार | Chitramay Anukampa-Vichar
श्रेणी : धार्मिक / Religious

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
420
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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द विजय -अनुखस्या-कचार $
५
दाह
करणा वर्गाल्य प्ररे, सङ्ख्य अनन्तं 1
जध-जय जिनक्श विद्ुधदर, सुखमय छुषमावन्त ॥ ११
अनन्त जिन हुआ केवली, सनपय्येव मतिमन्त !
अवधिधर छनि निमा, दरापूवं रुन खन्त ॥ २॥
आगमन बलिया ये कहू; सषे उगत सार।
वचन ने ब्रद्ध तेहन, ते झछ्से संसार ॥ ३ ॥
अचुकम्पा आछी कही; जिन-आगप्त रे सांप ।
अज्ञानी सोवज कहे, खोदा चोज़ लगाव ॥ ४ ॥
हालां नदि, जालं इह, अलुकस्पा री. घात |
पंचमकाल प्रसाव थो, हा ! हा ! जिखुदन तात ॥५॥
अघुकम्पा उखयवा, माड सा जाल |
मुरख सचूला जथो ए स्या, सले अनन्तो काल ॥ ६ ॥
हुःखमि आरे पचते, ङुणुर् च्छायो पन्थ!
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