श्रीमद्भगवद्गीता | Shrimadbhagvadgita

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Shrimadbhagvadgita by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भापाटीकासमेत 1 (७) भगवत्परमेशाने भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ जायते सततं तत्र यत्र गीतायिनंदनम्‌ ॥ ३३॥ जहौ गीताके अथंका निरंतर विनोद होता ह तकँ भगवानमें अतिउत्तम अखंडभक्ति उत्पच्च होती है । ३३ ॥ प्रारव्च सुजमानाअप गाताभ्यास सदारतः ॥ स सुक्तः स सुखा करकं कृमणा नपबध्यत ॥३९॥ जो स्वकाल गीताहीके अश्यासमं निरत हे वह भारब्यवशसे संसारी गता हैं, तोभी वह मुक्त आर सुखी ₹, तथा कमसेभी वैधनेका वहीं हे ३४ छ, कि, ७०७७. महापापादपापान माताऽध्यार्या कसात चत्‌ ॥ न्‌ कचत्स्पररत तस्य नाटनादलक्पसथसा॥ ३॥ जो नित्य गीताका श्रवण, पठन) मनन, करता हो ओर वह्‌ दवयोगसे भख बह्महत्यादिक महापापी करे तोगी जलकरके कमलपत्रवत्‌ क्क = अ ०५ ~ चित्त नहा होता ह।॥ ३५ ॥ स्नातो वा यदि वाऽस्नातः शुचि यदि वाऽश्ुचिः॥ विभूतिं विश्वरूपश्च संस्मरन्सवंदा चिः ॥ २६॥ स्वनि कय हय अथवा चव कय हाय पावत हाय अथवा अपावत्र हाय विभरूतियाग आर विश्वरूपद्धन अध्यायका पटताहूवा सदा पावत हता २६ अनाचारेद्धव पापमवाच्यादि कृतं च यत्‌ ॥ ~ अयश््यमक्षनं दोषमस्पशस्पशजं तथा ॥ ३७॥ ज्ञाताज्ञातकरतं नित्यमिद्वियेजंनितं च यत्‌ ॥ तत्सवं नाशमायाति गीतापठिन तल्षणात्‌ ॥३८॥




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