वक्तृता | Vaktrata

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कदा १५की ्दृततिश्र्थीव्‌ रयोग होत ह दा हु ठै, से पधुत्ति-निष्िख मानते इ । णम्‌ धातु शौर ङ्‌ घत्यय क अवयवथं से भौशुष्द की प्रदूत्ति कमी नहीं हुई थी, यद तो केवल व्युत्पत्ति_ निमिस मात्र है । गो जाति घा गोत्वजातिविशिष्ट भै णोशब्द क्रा प्रयोग होला दै, द शि उस काश में ही थो.शब्द का संकेत स्वीकार करना पड़ता हे-स संकेत यमू चातु झारडोखू प्रत्ययणत नहीं है, इससे थी {6 शाब्व्‌ छद्‌ दै । पर््तुपासफ व रसोइया शब्द रढ़ नहीं; यौगिक ही है। क्योंकि4। पाचक इख वणे सुदाय ऋ 'ऊन्ली रथं विशेष मँ संकेत नदींहै । केवल 'श्रवयव संकेत थीत प्‌ चु श्र खुश प्रत्यय के थे से टी पाकर्पर्ता छोथे की जानकारी होती है! सश्चदाय के संकेत स्वीकार करने का फाई कारण नदीं दिखता | इसलिष्य हौ (पाचकः श्य्‌ को यौगिक मानते हैं। यथाये में याद शष्ठ रु नदी है। न धं गा डे छीर बम 5 गये ` उक्त संझेत थी दो प्रकार कृ है। छाधुलिक छोर सनातन ।जो संकेत झनादि काल से जला शा रद है, चह सित्य छरसनातन है ¶ परन्तु ओ सेत पैसा नहीं अर्थात्‌ दीच भ काल-विशेष में जिसकी मयूत्ति हुई है, उसे आधुनिक कतेहैं । नादि काल से धरघुक खनप्ठन संकेत का ही दूसरा नामशक्ति, दर छाधुनिक का. परिमावा है। सनातनी संकेत वा .शक्ति झालुलार जो शब्द जिस छार्थ का बालक दै, अनादिकाल से उस शब्द का उस रे मेँ ग्ही प्रयोग भी चला था रहा_ है। परन्तु झाघुनिक संकेत, वा परिभाषा से शब्द का जो थेउत्पन्न होता है; उस श्यै भ उख शब्द का. डानादि काल सेअयोग न तों होता दी है औौर न कमी दो दी लष योमकिःभ




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