शिक्षामणि | Shikshamani

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Shikshamani by दीननाथ देव - Dinanatha Deva

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[1 प ( £ ) 0 अटल स्नानयािर वायस पालिय श्रति श्रलुरागा ! ोडिनिरामिपकबु किकार्गो है न्दौ सन्त श्रमन्नन चरणा । दुखप्रद उभयवीच कछुवरणा ॥ विछुरत एक प्राण रि लें! मिलत एक दारुण दुखटेरीं ॥ उपजद्धि एकसद़् जलमारीं । जलजो कलिभिगुणविलगारीं ॥ सुधा सुरा मम साधु च्रसाधु। जनकं एकं जगजलधि श्रगाघु ॥ भलय्रनभल निजनिज करतृती । - लहतदय श्रपकक विभूती ॥ सुधा सुधाकर सुररुरिसाधू । गरलश्रनलकलिसल सरिव्याधू ॥ युख च्रवगुण जानत सवक्राई। जेगजेहि भाव नीक तेदिसोई ॥ टो भक्ते भलारपै लद्धं लटि निचादई नीच । सुधा सराददिट अमरता गस्लसराटिय सीच ॥ खलअघ अगुणसाधु गुणगाद्ा । उभय श्रपार उदधि अवगाहा ॥ तेदिते कदु गुण दोप वसवान । सम्रद्त्याग न विनुपद्िचाने॥ भरे पोच स॒वविधि उपाये ! गनि गुरुटोष वेद विलगाये ॥ काहि वेद इतिहास पुराना । विधिप्रपक्लगुण घवगुणसाना ॥ दुख सुख पापपुख दिन राती। साघु प्रसाधु सुजाति ऊुजाती । दानव देव जांच अश नोचू । ग्रननियसजोवनि माहुरमोचू ॥ माया ब्रह्य जीव जगदोगा। लच श्रतक्त रंक श्रवनीशा ॥ काशि मगन्न सुरसरि कमनासा ) सस्‌ मालव मद्िदेव गवाशा ॥ खर्म नस्क श्रनुराय विराम लिमसागम गुणदोष विभागा ॥ दो जड़ चेंतन गुण्दोपसय विष्ठ कीन्ह करतार ॥ । सन्त सगुण गद्द्धिंपय परिंदरि वारिविकार ॥ ्रमविवेक जव देद्धि विधाता। तव तजि दटोषगुणददिं मनराता॥ काल खभाव कर्मं वरिश्रादई। भलेड प्रकतिवश् चुकभलाई ॥ सो सुधारि इरिजन जिमिलेदीं । दलिट्खटोष विमल यशदेद्ीं ॥ खलडहु करक्ति भलपाइ सुसगू। मसिंटक्चि न मलिन सुभाव अभयू ॥ लखि सुवेघ जग वच्चवा जेज । वेष प्रताप पूजियत सैऊ ॥ उघरद्धि प्रनत न होर निवाद्ध। कालनेमि जिसि रावण राह ॥ किये कुबेष माधु सनसनू।1 जिमिजग जामवन्त नुमान्‌ ॥ खानि कुसद्न सुसङ्गति लाद । लाकष्ु वेद विदित खव काद ॥ बुध ऊनजनररूरसननसननसनरननसरनररररखसनरसररूसरनरनरूरूरूख




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