पद्मावतीपुरवाल दिगम्बर जैन जाति का उदभव और विकास | Padmavati PurwaL Digambar Jain Jaati Ka UDbhav Aur Vikas

[adinserter block="2"]
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
16 MB
कुल पष्ठ :
448
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)कुछ तथाकथित उदारचेता जनों की दृष्टि में इस प्रकार
जातियों-उपजातियों की पहिचान को रेखांकित करना सामाजिक
एकता के विपरीत ओर अनावश्यक कलहा जाता है, परन्तु
वास्तविकता एेसी नहीं है । बाग-बगीचे की शोभा तभी है जब
उसका हर पौधा अपनी विशिष्ट प्रजाति का प्रतिनिधित्व करता
हो । उसकी हर बेल, हर पत्ती, हर कली ओर हर पुष्प अपने-अपने
विशेष रूप-रस-गंध ओर स्पर्श से सम्पन्न हों । अपनी अलग
पहिचान रखते हों यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि इस
विविधता मे से ही एकता का सूत्र निकलता है । विविधता के बिना
एकता का कोई आधार ही नहीं हो सकता और अतीत का दीपक
हाथ में लेकर, उसके प्रकाश में की गई भविष्य की यात्रा ही सही,
सुरक्षित और सार्थक यात्रा होती है।प्राचार्य श्री नरेन्द्रप्रकाश तो स्थापित “सम्पादकाचार्य' हैं।
उनके सम्पादन में यह कृति संयोजित है तो आपका यह प्रकाशन
निश्चित ही सफलता का स्पर्श करेगा। इस उपयोगी और
सामयिक प्रकाशन के लिए मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं ।
आपके इस सार्थक योजना के कार्यान्वयन के लिये हार्दिकबधाई।
-नीरज जैनशांति सदन
सतना (म.प्र.)
User Reviews
No Reviews | Add Yours...