दूसरी दुनिया का मुसाफिर | Dusari Duniya Ka Musafir

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Dusari Duniya Ka Musafir by रमेश सिन्हा - Ramesh Sinha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२ उस व्यक्तिगत अपभान को सहा नहीं भा सकता था सकस की रग-सूमि तमाशबीना से जब खाली हो गयी नीर ऊषर षी एक कां छोडकर होप सब रोशनियाँ बुया दी गयी तब ह्वाइटी टदवाइटी को फिर वहीँ ले लाया मया 1 शिमिट ने ट्रैनर से दष्टवास्त की फि जब ये ह्लाइटी-टवाइटी के साथ प्रयोग करें तब बह वहाँ से चला जाय । उस छोटे से आदमी ने अपना सकस वाला कोट अब उतार दिया था और केवल एक स्वेटर पहने हुए था । दिमट की वात सुनवर उसने किचित अपने व थे उघकाए, पर बोला कुछ नहीं । “मेरी बात का बुरा ने सानिएगा मुझे माफ कीजिए, मे आपका नाम नहीं जानता,” रिमट ने शुर किया) “जुड्ठ, फ्रेडरिक जुद्ध । आपकी लिंदमत में हाशिर हैं ।” “अच्छा, सुनिये । बुरा न मानिएया मिस्टर जुड़ । हम प्रयोग इसलिए करना चाहने है जिससे कि कही भी कोई शक वी गुन्जाइय न रह जाय +” ग्जरूर कीजिए,” टूंनर ने जवाब दिया । “जब हाथी का काम सत्म हो जाय तो सुये बुला लीौजिएगा 1 -कहूगर बट दरवाये की तरफ चला गया । वैचानिको ने अपने प्रयोग शुरू कर दिये । हाथी उनकी वात ध्यान सं सुनता आता मानता, उनके सवाला के जवाब देता । एव भी गलती किय बिना तरह-तरह की समस्याओं वे समाधान उसन प्रस्तुत कर दिये। उसने जो क्या उससे सेब आश्चय म षड गये । अविलम्ब दिय जाने वाले उसके जवाब को बेवल ट्रेनिंग या चालवाजी की वात वह कर नहीं सरत्म क्या जा सकता था । हाथी कै असा धारण बुद्धि थी, एव तरह से बिलकुल मानदी बुद्धि थी, इसस विंसी तरह इनकार नहीं किया जा सकता था 1 दिमट भी अब आधा हा गया था परन्तु केवल हव्वश वह वट करता रहा। १५




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