पंचाध्यायी प्रवचन त्रयोदश , चतुर्दश व पंचदश भाग | Panchadhyayi Pravachan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पाया डद _ ११ ० नोहा तत्राप्यतिव्याप्ति: क्षायिकात्यक्षसविदि । स्पात्परीणामवत्वे5पि पुनवृं त्तेरसम्भवातु ॥८४६॥ क्षायिक ज्ञानमे परिरणामवत्व होनेपर भी पुनटृं तिक्री भ्रसंभवतासे श्रतिव्याप्ति दोषका भ्रभाव--यहाँ कोई शद्धुाकार एसी तकं कर रहा है कि अर्थसे भ्र्थान्तर्‌ गतिकी जो विधि कही है उस विधिके अनुसार तो क्षायिक ज्ञानमे यने भ्रतीन्द्रिय सकल प्रत्यक्ष केवलज्ञानमे भी यह व्याप्ति पहुंच जायगी तो भ्रतिग्याप्तिकरा दोष श्रा जायगा । ऐसी शंका करने वालोके प्रति समाधान दियाजा रहा है कि देखिये--केवलज्ञानमे स्वाभाविक रूपसे परिणमन हो रहा है । - यद्यपि यह बात कह्टी है कि इन्द्रियज्ञानमे बार-बार जाननेकी वृत्ति हो रही है तो भी बार-बार वृत्तिकी बात, ऐसे केवलज्ञानमे न बतायी जा सकेगी । केवलज्ञानमे हो रहा है स्वाभाविकरूप से परिणमन निरन्तर प्रतिसमय चलता हुमा होनेपर भी पुनवूं तिकी बात नहीं कह सकते । - पुनवृं त्तिकी बात तो रागवश हुभ्ना करती है । जहाँ रागादिक दोष रख भी नहीं रहे वहाँ ज्ञान की पुनवूं तिका अर्थ ही क्या ? शकाकार श्रतिव्याप्ति दोषका प्रसङ्ग बतला रहा था । श्रति- व्याप्तिका अर्थ है कि लक्षण अलक्षमें भी चला जाय । भ्रतिव्याण्ति शब्दका भ्रथं है--श्रति मायने श्रधिक, व्याप्ति मायने रहना, याने जिसका लक्षण किया जा रहा है उस लक्ष्यमें तो लक्षणका रहना होता ही है । श्रगर लक्षक भ्रतिरिक्त श्रलक्षमे भी पहुंच जाय तो उसे श्रति- व्याप्ति कहते है । एेसी अ्रतिन्याप्तिको ध्यानमे रखकर शंकाकारका यह कहना था कि यदि कदाचित्‌ यह्‌ कहै कि ध्यानमे क्रमर्वातिता माननेसे केवलीके ध्यानमे भी क्रमवर्तिता श्रा जायगी । यहाँ साधारणतया यह्‌ कहा जा रहा है कि ध्यानमे ` क्रमवतिता होती है तो ध्यान तो केवलीके भी बताया गया है तो ध्यानमे क्रमवतिता है, एसा कहनेपर वरहा भौ क्रमवर्िता- का प्रसद्ध श्रायगा । उस शक्राके समाधानमे बतला रह है क्रि यहाँ म्रतिव्याप्ति प्रसंग यो नहीं प्राता कि केवली भगवानके श्रतीन्द्रिय क्षायिक ज्ञानमे पुनवृंत्ति नही होतो, श्रतएव वह्‌ क्रम- वर्ती नही है, किन्तु श्रक्तमवर्ती है अर्थात्‌ केवलज्ञान एक साथ श्रनन्त पदार्थोका जाननहार होता है । तो एसे निरन्तर विशुद्ध ज्ञातादृ्टा सवज्ञदैवमे जो ध्यान शब्दकी वृत्ति है यने उस स्थित्तिको जो ध्यान शब्दसे कहा दै वह तो एक उपचार कथन है, क्योकि वास्तवमे ध्यान त्तो श्रुतज्ञानकी पर्याय है । जहाँ वोतराग हुमा, सर्वेज्न हुप्ा उस प्रभुके श्रुतज्ञान कहां ? केवल ज्ञान ही है। इस कारण वास्तवमे ध्यान १२वें गुणस्थानके उपान्त समय तक ही होता याने श्रतिमं समयसे पहिले तक ही होता है श्रौर १२वे गुणस्थानसे १३वें युणस्थानमे निजेरा पायी जा रही है । इस कारणसे कमेंकी निर्जरा देखकर चूकि यह निर्जरा श्रव तक ध्यानके कारण हो रही है तो ध्यानका कायं निजंरा है, ईस तरहकौ वुद्धि रखकर वहां भी ध्यानका उपचार किया गया है । वस्तुतः ध्यान वदी तक्‌ है जहां तक्‌ इन्द्रियजन्य ज्ञान हो ।




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