प्रेम योग | Prem Yog

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ श्रीयणेक्ञायनम पीर = _ ५, ममयम प्रथम अध्याय | कुक साधनाः . - 30000 भक्तियोग की सर्वोत्तम परिभाषा संभवतः भक्त भब्हाद्‌ द्वारा दौ इ निन्ल परिभाषा दी हैः- ` या. श्रीतिर विवेकानां विपयेप्वनपायिनी | लामदुस्मरतः सा में हृदयान्मापसपूतु ॥ ~ विष्णु पुराण १-२०-१९ ५ हे ईण्यर ! अज्ञानी जनौ को ईन्द्रियोके भोगके नागवान पदार्थों पर जैसी गाढ़ी प्रीति रहती दहै उसी भकार की प्रीति हमारी तुभ में हो और तेरा रुमरण करते झुए: हमारे हृदय से बद्द खुख कभी दूर न होवे ” हम देखते हैं इन्द्रियमोग के पदार्थों से बढ़कर ^ और किसी बस्तु को न जानने वाले लाग इन पदार्थों




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