शंखमुखी शिखरों पर | Shankh mukhi Shikharo Par

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Shankh mukhi by

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सिर्फ छंटपटातौ लहरों की दर्पण सी हथेली में प्रतिबिम्ब सिरखते ढहे कुल मेरे हैं ! केसर का अनचाहा दर्द भ्राज वर्षगांठ मना रहा दहै, गुलाबों की टहनी के अ्रगन्ध-शूल मैरे हैं ! शंखमुखी शिखरों पर




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