जैन सिध्दान्त भास्कर : भाग 4 | Jain-sidhant-bhaskar : Bhag-4
श्रेणी : धार्मिक / Religious

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
118
श्रेणी :
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लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
ए. एन. उपाध्याय - A. N. Upadhyay
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कामता प्रसाद - Kamta Prasad
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हीरालाल जैन - Heeralal Jain
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)फिर ३ | समीद शिघ्रनी की यात्ना का समाचार १९५नता । स्वनाम की पर मी लक ने 'पना नाम सूचित नहीं क्या है। फिर भी हमारा
श्रतुमान है दि यद् स्वना वहत क्र के कनियर श्रीर्मलनयन जी की हे, कयोप पहल तो यह
साह नदराम धनसिंद के समकालीन 'छीर उन से घनिष्ता रसनेगाले थे रौर
दूसरे उस समय मेंनपुरी में हि न म पता स्वनेगाल चही मिलते हैं । इस रचना
का सादइय भी उनयी रचनाश सरै] यह वातभी ध्यान देने योग्य है
कि साहु घन सिं कतरि कमननयने वे सदश धीता सजन फो सध कं साथ जरूर लेगये
श्ेगे। इसलिये उदनि ही थायां का पूण वियस्स प्यवद्ध किया दोगा भौर माह धन सिद
'रादि ने उसे लिसवा फर मंदिर श्रौरं श्रावको को मटक्िया दोगा) माद्धूम पेमा हतार
फि कमलनयनजी की रचनाश्रों वो लिसवो कर यह मददाहुभाव सवसाधारण में प्रचलित फर
देते थे, क्योंकि उनके समय की निसी हुई प्रतिया मिलती हैं । च्छा तो, इन कपि कमन
मेयन जी का परिचय पां तेना भी उपयुक्त है-यह परिचय केवल उों के प्रर्थों स प्राप्त होता
है रौर बहु दी सक्ति्त है। मेंनपुरा क घुलेले जैनियां स उनके वारे म छुछ भी धात नक्ष
हुआ । उन के लिये यह पक नया समाचार था कि कोर कि यमलनयन जी उनके मध्य
हो गये ह| जहा अपने निकलती माय पूज का परिचय लोगों को प्राप्त न हो; वहा उहें
श्रपनी जाति चौर शल फे महल सौर गौर का भान मना क्या होगा १ रर, खय पथि
महोदय के श्चतुर से द्म जानते दै रि वद् ( कवि फमलनयनजी ) मैनपुरी फे श्चधिगासी
घुढ़ेले जातीय श्रायकोत्तम थे 1 उनके पितामदह् गय हरिव द् थे श्रौर उनफे पिता का नाम
श्री ला० मनसुससयजी था जो एक 'न्ठे वैध थे । इन मनघुखतयज्ञीक दो पत्रथे। जेदे
पुन फा नाम छतपति और छोटे फा नाम कमानयन था। कमननयन जी ने पर्दीन्क्दी
पर कमिता म पना नाम 'इगक्ज' भी दिया है। उदाने जेनधर्म विपयक बई मम्थों की
मापा स्वना पय मे कौ दै, जिमते पना चलता है फि बद एक धर्मेक्ञान लिये हुए वियरी
सब्जन थे ।1$ उनके समय फा वहुमाग धम त्रिपयक चचौ-वातो मे यीतता था] एक समयकफम नयनकी. *घोसवासा बंद रस रथर्च्य पानि] रात विक्रमाददय नृप गतप मदिन्
कारिक सुदि पुम पचचमीकयौप्रय जरम] चत्र ्ष्यतेरसि तिथी प्रन भयौ निदम॥
[4 जद तर श
जात बुदेले शानिये यहीं मद्दा धनरत । सद्राम आादिक हूत सामां शुने 1
तिनही में हुक जानिये नाम गय इरिचदू । वैद्यरुक्ला परयीन डति सनसुय गाय सुन दू ॥
तिनके सुन जड़े मएू नाम छुलपतिसार | तिन लघु झाता जानिय कमलनयन निरधार ॥
एक समय निस द्द् पुर गये मयाग समकाए । सन में इच्छा यद मई बीज दश दिदार ॥
तवीरथरा प्रणगवर सदं श्ादग चहु खाय । शागग्वाह्ते रतियर बसे मद्दाइन साय ए
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