नारीसुदशाप्रवर्त्तक [ भाग 4 ] | Narisudasha Pravarttak [ Part 4 ]

Narisudasha Pravarttak [ Part 4 ] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ १५ ४३ जे सुख समय परमात्मा को भुलती है वच शीघ्र दो दुःख में पड़ती दे ४४ ना घन का मद्दालाम करती ह वड सन्तापं का कौप खाती है ॥ १५ जे दीनों पर दया नहीं करती वच् कठारचित कद्दाती ३ ॥ ५६ जे स्वी पति की देवा नद करती जर आन्नाभङ्ग करती दे उस- का व्रत दान पष्य पना सव ब्रा ई ॥ १० सब्र से उत्तम ध्मेधोला पतिवृता वद स्तो है ले परपु का ध्यान स्वपुन मे भी नदद करती ॥ पद ना स्त्री 'अधर्म से हर कर पराये पप को चाचा तारं या भाई समान नानती ३ षह भीं उत्तम ३॥ ५४६ लो स्वी कुलकान या अपवाद के मय से पाप कमे के ददती रै यदह मध्यमां गिनी लाती ह ॥ ६० वद्ध सनी नीच गिनी लाती है ने अवसर न मिलने जरी राला प्र- ' ला के दयडमय या व्यमिचारी पुरुष न मिलने क्ते कारण सुकर्म से बची हुई दै॥ ` ६९ लीवमान के लिये कामदेव वहा धच ह इसको आंधी को वयुले ` भे पद्ने षे सारी उमर फा सुख उद्‌ कर मु पर घुल सी छा ला- ती है ॥ ६२ ला सची सांसारिक मेणों में मग्न सार पिपत्ति में रोती है धद पे य्यवती नष्ं ष्टदलातो ॥ ६३ कामः फ्रोध, जोम, में का याचित वतीय रवा दन को श्म घिकाई बड़ी दःखदाई है ॥ = ६४ ले स्वी हयो, दप, क्तो, लड़ाई, दाह,युन्, दल, नाराज, लगा- शूतरापन आदि औओगुनों से यची इै और पति को सेवा और पममे.




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