खूब कवितावली | Khub Kavitavali

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Book Image : खूब कवितावली  - Khub Kavitavali
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ खूब फवितावलीपाण' इन्द्र थौर '्यचूँ इन्द्र माय, लेकर सय परिषारजी ॥ १॥ सट 'पीरासी थरमी बदोतर, मौठर साठ घगान ।पचास चाक्ली तीस धस दशः, सामानिक सुर जान ॥चार गुणा सामानिफ पुर से, धाठमर्त परमागजी ॥२॥ धारा सहस्र चवदा घलि सोला, तीन परिपदा माँय !दो दो सदस्र फम फरके उपर, दो दो सदस्न धढ़ाय 1दे इन्द्र तक इणबिघ लीजो, चतुर दविसाध लगायजी ॥ ३॥ सदस्र पॉनसे ढाई से जी, फेर सबा सो थाय।दशसा २ दीन फे तुम, क्षीजो जोड लगाय॥इतने सुर पक एफ इन्द्र फे, दीन परिषदा सॉँयजी 1॥ ४ ॥! लक्त जोजन छा लम्बरा चौड़ा, 'मायारच विमान ।पक सस्र जोजन फो सष के, मदिन्द्र प्रजा परिमान॥सुघोपा महाघोषा घण्टा, पांच पांच फे जानी ॥५॥ पमरिन्द्र॒ घलशन्द्र प्रमुख, भवनपति छे दीस ॥काल और मद्दादाल थादि दे, व्यंतर के बत्तीस ।धन्द्र सूये इन्द्र मिक्त दो गए चार बीस चालिसजी ॥ ६ ॥ अप लघ जोजन रम्वा चौड़ा, 'अपुरं का विमान ! धरणिन्द्रादिक श्रष्टादश के, सष्टख पच्चीस प्रमाण ।उ्यतरिन्द्र श्मौर रवि शशि फे, सष्टख जोजन फा मानजो ॥ ७ ॥ वैमानिक से झाघी ऊंची, जानो श्चसुर छ्मार 1नवनिकाय के दाई से की, मदिन्द्र प्वजा विस्तार ॥सौ जोजन उपर पच्चीस जोजन की, व्यंठर जोतिपी धार जी ॥>॥ ए घिध हुआ समागम सुर फो, जिन महिमा के काल |मेरे गुरु गण धागर मानु, नन्दलाल महाराज ॥गाषलपिन्डी जोड़ धना, जरिया * वंदि छाजजी 1- ~१ प्राएत। ९ अच्युत ३ सिद्ध हुआ 1




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