पोथी प्रेमबनी भाग - iii | Pothi Prembani Bhag iii

[adinserter block="2"]
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
466
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)3
। लि
|
मेरे लगी प्रेम की चोट विकल मन अति
मेरे हिये मँ बजत वधा सेत सग पाया रे
मँ गरु प्यारे के चरनौँं की दासी
में तो आय पड़ी परदेस गेल कोइ घर की. -.
मैं तो होली खेलन को ठाढ़ी न
में पड़ी अपने गरु प्यारे की संरना
में सतगरु पे डालेगो तन मन को बार
मे हदं सखी पने प्यारे की प्यारी
२०६
मोहि दृरस देव शुर प्यारे कयौ एती देरलगडइयौ ५९
०० २६६
यह दैस सुभि नहि भावे
यह् सतसंग जौर राघास्वामी है नाम
रागी जन माया के पाठे पड़े
रात्त. गुरु मेदी ने मम से याँ कहा
साघास्नामी चरनन अजो रे मना
राघास्वामी छवि निरखत .मुसकानी -
राघास््रामी छवि मेरे हिये चस गहं री
राघास््रामी दराल सुनो मेरो विनती
राधास्वामी दृत्ता दीनदयाल
राघास्वामो दीनद्याला मोहिं दरशन दीजे
राधास्त्रामी दीनद्याला मेरे सद किरपाला
राधघास्वरामी सतगुरू पूरे में आया सरन हजूरे
न~
३९६
२५२
“ ४१
३०
१८४
०१ र् ९७
०५ य् ७१
User Reviews
No Reviews | Add Yours...