श्री तुलसी संग्रह | Shri Tulsi Sangrah

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Shri Tulsi Sangrah  by गोस्वामी तुलसीदास - Goswami Tulsidas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( £ ) दिही के दुगं पर चह णये श्रौर उपद्रव करने लगे ! किले के कंगूरे तोड़ वे महल सें घुस गये । सारा नगर वन्द्रों के श्त्याचारों एवं उपद्रवों से जस्त हो यया । तव ते अकबर बहुत घवबराया। उसको घवराया इध्मा देख, उसके कतिपय शुभचिन्तकों ने उसे समसा कर कहा कि. झापने जिनके चेद्‌ किया है उनके इतुमान जी देव ह । यदि श्राप उन्हें छोड न देंगे, तो ये बन्दर कोई बड़ा उपद्रव खडा कर दंगे ! इस लिये श्राप उन साधु को श्रमी कड दे । अकवर ने ऐसा ही किया और गोसाई' जी से हाथ जोड़ श्रपना श्रपराव क्षमा कराया । सरल श्ौर उदार हृदय तुलसीदास ने उसका अपराध क्षमा कर दिया श्रौर कहा तृ श्रीरामचन्द्र जी कों देखना चाहता था से उन्होने पहले श्रपनो सेना भेजो है । वे स्वयं भी श्माते ही होगे तू देख लेना । ” यह खुन श्रकवर बहुत ललित इच्या श्योर ्ननेक बहुमूल्य वस्तुपं गेसाई जी के भेट की । उस भट को श्रस्वोकार कर तुलसीदास ने उससे काश्व इस नगर मे श्रीरघुनाथ जी का भंडा गङ्‌ भया! तू श्रव कही छान्यत्न नया स्थान लना क्र रह । ” कहते है, श्रकवर ने पुरानी दिल्ली कोड णादजौनावाद्‌ नाम का नया नगर बसाया श्रौर षहँ जाकर हं रहने लग्ग । दिल्ली से लौटते हुए तुलसीदास दुन्दावन गये । कद्दा जाता है, उस समय चृन्दाचन में सद्दात्पो नाधादास जी विद्यमान थे । तुलसी दास जी उनसे मिले । नाभादास जी ने उनका वड़ा भाद्र सत्कार किया घौर उनको प्रणंसा करते हुए एक छप्पय बना डाला । षह छप्पय यह है :- ५ श्रेता कान्य निवंघ क्री सत काटि रमायन । इक शच्छर उद्धरे बद्य-हत्यादि-पराथन ॥




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