कविता कौमुदी [भाग 5] | Kavita koumudi [Bhag 5]

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Kavita koumudi [Bhag 5] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कोई कह रहा है-- पीठाः कऋच्छपवत्तरन्ति सलिले संमाजनी मीनवत्‌ । दर्वी सपंविचेष्रितानि कुरुते खंजासयन्ती शिशान । दूर्पाघोवृतमस्तका च ग्ृहिणी सिंतिः प्रपातोन्मुखी । रात्रो पूणेतङ़ागसन्निममभ्‌ द्राजन्मदीयं ग्रहम्‌ ॥ षे राजा ! रात में मेरा घर जल से एणे तालाव की तरह हो जाता है । उसमें पीदे तो कछुवों की तरह, झाट्ट मछली की तरह तैरने लगते हैं । कड़ी साँप की तरह चेष्टा करके वस्वो को भयभीत करनी है । ख्री सूप ते आधा सिर ढक लेती है और दीवार गिरने वाली है ।? गाँवों की फटी हुई दीवारों, एक वार पानी बरस जाने पर घंटों रोने वाले, चिथड़े जैसे छप्पर, सड़ी हुई गलियाँ, अस्थि-चर्माववोप नर- नारी भयानक हाहाकार कर रहे हैं, जो कानों से नहीं, आँखों से सुनाई पढ़ता है । ग्रहाँ तो घर-घर में उस घासवाली बुद्धया के जीवन से कहीं अधिक भयानक दद्य उपस्थित है । देहात के रोग तरह-तरह की रुध्य मेँ जकडे हुये अधःपतन की आर जा रहे हैं । उनमें धर्म की भिन्न-मिन्न व्याख्याय प्रचलित है । मैंने उस घासवाली बुढ़िया को कुछ पेसे देकर सन्तोप खभ किया था । पर क्या वह सच्चा सन्तेष था ? नहीं । आत्मा जगने वाली थी । मैंने उसे थपकी मारकर फिर सुला दिया था । थोड़े पैसों से क्‍या ? यहाँ तो समूचे जीवन-दान की आवश्यकता है । में सोचने लगा--इश्वर ने इस देवा को गरीव चनाकर दिक्षितों को अपनी सनुष्यता के विकास के लिये कितना लगम्बा-चोड़ा सेदान दे दिया है । दिक्षितों को अपने गाँवो के नीरव हाहाकार को, जो जीवन-साफल्य के किये इश्वर की पुकार है, सुनना चाहिये । गौवों की दशया देखकर वार-वार नन को विक्षोभ ओर नाँखों को जल-रेखाएँ घेर लेती थीं 1




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