आजादी के परवाने | Ajadi Ke Parwane

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Ajadi Ke Parwane by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( नी ) सुभीते की वस्तु होती ह 1 जनता जव तक जपने स्वाथ या भधिकारों से वञ्चित रहती है, तत्र तक इस तरद उदासीन रहती है । इसले अधिकारी भौर भी अवसरवादी हो जाते हैं । परन्तु अन्त में सत्य खुलता है ; भसन्तोष उत्पन्न होता है और जब जनता में कोई सच्चा महात्मा उत्पन्न हो जाता है, जो इस अन्पाय को नहीं सह सकता, तो वह इंद्वर भर धर्म के नाम पर सत्य का पक्ष छेकर छढ़ता है । यदी क्रान्ति है । क्या स्वर्गीय महात्सा गाँघी क्रान्तिकारी नहीं थे ? कानून जो कान्ति षे भय खाता और उसकी निन्‍्दा करता दै, उसका कारण उपयुक्त ही है; परम्तु जनता भी क्रान्ति से इतना भय खाती है, कि वह चुपचाप बड़े से बढ़े अत्याचार सद कर भी कान्ति नहीं करना चाहती । मेरी समझ में इसका कारण पुझुषार्थदीचता नौर इन्दिय- दासता ही है । जो तेजस्वी हैं, जो मान-धनी है, वे भ्रपने झोपड़े से अपनी दो चटाई पर सुख से सो सकते हैं। उनके पास चाहे छांख चटाइयोँ हों, यदि कोई बढपूवक उनकी चटाई को ले छेगा, हो वे उसी ` चदाह पर लड़ मरगे, चाहे वद चटाई छीनने वाली कोई जगद्विजयिनी शक्ति हीक्योंनहो! राज्यकान्ति हमेशा राजकोय कानूनों के दुष्परिणामों से होती है । भतएव कानून को बुराई कान्ति की उञ्जवलता गौर पवित्रता मे कदापि दोपारोपण नहीं कर सकती 1 जव तक क्रान्तिकारी पुरुष उदार, महान, चीतरागी, वीर, धीर, दद्‌ भोर सत्यवक्ता है, तब तच क्रान्ति पविन्न, सस्य भौर अनुकरणीय ध्म है । यह दण्ड पर दण्ड दै । जिस प्रकार दण्ड से सव भयभीत होकर नियन्त्रित रहते है, उसी प्रकार करन्ति




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