जैनव्रतकथासंग्रह रत्न | Jainvratkathasangrah Ratn

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Jainvratkathasangrah Ratn by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ = ` ऋपिपंचमीततकथा । ७ देख विभति पुत्रकी सोई । सत्यकिधोयरस्वप्राहोई॥&२॥ भविकदत्त बोखो वर बीर । मिरो माय मोको परधीर ॥ मुनेवचन तव संशय गयो । गहभर अंक पुचभेटयो।६9॥ बंघुदत्त जो कीनों पाप । कहो सबे मातासे आप ॥ माता बोलो कर उत्साह । ते वेधुदत्त करे व्याह ६५॥ सो नित चित्त पतित्रतधरे । तापे मूढ व्याह विधिकरे ॥ सतो बहू तुम्हारी आइ । ताको देहु पारनो जाद्‌ ६६॥ वृघ्राभरन दहे मिते मातको पहिरये तिते॥ अरु निजकरकी मुंद्री दे । वेठ सुखासनसों तहूँ गढ़े ६७॥ कमलश्री आवतही देख । रुपश्री मन भई विशेष ॥ मिीपरस्परजियस्ुभयो । करसन्मानवेटकाद्यो ॥६८॥ कमलश्रीमंदिर पर गई । वचन सुनाय सो ट्टी भई॥ तवतिन जानीभपनी साप । पड़! पव हटर्देरसस६९॥ अरु सुतकोआगमनसुनाइ । दें भोजन गृह पहुँचीजाय ॥ भविकदत्त ॒राजापरगयो । मि रजा आनेदितभयोऽ तथे राय सुन सो वत्तांत । कधन सकोसम्ार महंत ॥ किकर पठटये पटच नाय । वधुदत्तको खाये घाई ॥७१॥ आये ठोग संग के स्वे पृंछतिन्दं सोह दे तवे ॥ तिन राजा से सचीकही । सबधनभविकदत्तको सही ७२ राजासुनतकाप अतिकियों । वन्धुदत्तकदिण्ड सु दियो ॥ अपनिसुता पुनि दौनीराइ । कर विवाह मंदिर परुँचाइ॥७३ भविकदत्त माता गुणभरी । पुत्रठयों मेने झुभ षरी॥




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