घटनाएं जो इतिहास बन गई | Ghatnaen Jo Itihas Ban Gai

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Ghatnaen Jo Itihas Ban Gai  by शंकरदयाल शर्मा - Shankar Dayal Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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३३ सत्यं हिव की राह पर घटनाए आकस्मिक ओर तात्कालिक होती है, पर कभी-कभी वे जीवन की धारा को आमुल परिवर्तन दे देती हैं । मेरा दीक्षा-प्रसग भी किसी एक घटना-विशेष पर ही फलित होता है। क्रांति घटित हो गई जीवन के बारह वष पार कर तेरहवें वर्ष मे प्रवेंश कर चुका था । अपनी न्म-भ्रूमि सरदारशहर के राजकीय माध्यमिक विद्यालय मे पाचवी कक्षा का विद्यार्थी था । देनिक, मासिक पत्र पश्रिकाए, महापुरुषों की जीवनिया तथा समाज- सुधार सम्बन्धी साहित्य पढने मे विशेष रुचि रहती थी । प्रगति-मूलक साहित्य के कारण विचार भी प्रगति-सूनक बनते । समवयस्को और प्रौढो के बीच बैठकर भी सामाजिक ढरों व रूढियो का विरोध करने लगता । प्रौढ लोगो को बहू छोटे मुह बडी बात लगती । नये विचार भी उनके हृदय को नहीं छू पाते । उन्हे लगता, थोडी-सी पढ़ाई मे भी इसका दिमाग खराब हो रहा है तो अधिक पढ़ लेने से न जाने क्या होगा * पारिवारिको ने प्रतिबन्घ लगाया कि तुम अपने पादुयक्रम की पुस्तकों के सिवाय बाहर का कोई भी साहित्य नही पढ सकते । घर मे रही पुस्तकों की अलमारियों के भी ताला लगवा दिया। पुस्तकालय जाना भी बन्द करवा दिया । मेरे मानस पर यहू मारमिक आघात था । पढ़ने की लालसा असीम थी और सम्बन्धित वातावरण उसके नितान्त प्रतिकूल था। बस, इसने ही जीवन में एक क्राति घटित कर दी । उन्ही दिनो तेरापथ के अष्टमाचायं परम पूज्य श्री कालूगणी सरदारदाहर पधारे । साधु-साध्वियो का बृहद्‌ परिवार उनके साथ था । उनके प्रभापूर्ण व्यक्तित्व ने मे सहसा खीच लिया । वण्टो-घण्टो सामने बैठकर उन्हे अपलक दृष्टि से निहारता रहता ! सहसा मन मे विचार कौध गया, अरे ! यही तो मेरी संमस्या का समाधान है। जीवन भर पढ़ते रहो, पढ़ते रहो, कभी रुकावट नहीं । आत्म




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