महादेवभाई की डायरी भाग २ | Mahadevbhai Ki Dayri Khand-2

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Mahadevbhai Ki Dayri Khand-2 by नरहरि भाई परीख - Narhari Bhai Parikh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९११९ [पंजाब लौर पुडरात में हुए द्ों के बारे में आंच करने के लिए मिपुक्त हुंडर-कमेटी के सामने अहमदाबाद ( हुठौसिह की थाड़ी ) में मॉधीजी की दी हुई इदाइत ] लिखित इकरार सस्पाप्नइ की ब्यास्या थु पिछडे ठीस बपों से में सत्पाप्रइ का उपदेश सौर पाढन करता था रद हूँ । सस्पाय के सिदांतों के नि स्वस्य को मी आयाम चानता हूँ, ससका पीरे-पीरे बिकात दुस्टा है। सचरी भर दद्षिजी प्ुष के बीच बितना अन्तर दे, उतना दी तत्यां- प्रह शोर पैसिष रेजिर्रेंस' के बीच हे । 'पिठिय रेडिस्टेंस' कम बोर यगा का इपिपार हे । सपना उद्देश्य पूरा करमे के मपि रीरि भढ कमर हेने या एंगे करमे की उतमें रुकाबर नहीं । परम्तु सस्वाप्राइ हो श्पस्यंत चभ्स म्पक्तियीं बम एब्म दे और उततें किसी मी प्र्मर का दंगा मचाने शी कलना त नहीं दो लड़ठी । दधिण सफ्रीका मैं पूरे आठ बर्प तक दिस्तुस्तानिर्यों ने बिस बढ का मबीग किया था उस बल का नाम मैंने हल समय “लस्याप्रद रला था | उवी मरखे ध विरि यङो वपा दिन मद्य त धपैरसिष रथिरः का सालोहन 'चछ रा प्य. इतसिए उससे मेद्‌ दिलाने के वि ममे मद म्द निष्द्यपा। इस सम्द च्म मूढ सयं हत्य का मापड रै! यथेत्‌ धप क्छ रे । मन चे धवेमषढ मवा माप्ममड मी ष्ठ र | टेर परू ही शत्य शप्र समल करके मैंने देख सिम प्य कि साय के पाठन में शामनेबाति पान प इमस्स ऋरमे का इसदा दो दी न हमद, परव्तु उत्में भीरज य




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