मेरी हिमाकत | Mari Himakat

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
136
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)कवि से ७रहा हो, तुम एक-दो कविताएँ तो उसे रास्ते चलते-चलते भी सुना
देते हो। कोई भी काल हो, कोई भी स्थान दो--यदि वह रसिक
है तो,उसे ठुम कविता सुनाये बग़ेर छोड़ नददीं सकते ।तुम्हारे प्रशंसक भी प्रशंसा के पात्र हैं, जो तुम्हारी कविताओं
से ऐसे-ऐसे गूढ़ श्रथ निकाल लेते हैं, जिनकी शायद तुम्हें भी
कभी कल्पना न हुई हो । ठम्हारे नम श्दज्लार में वे कभी श्रध्यात्म
का दशंन करते है, श्रौर कभी क्रोध, देष दौर श्रदंकार के उद्दी-
पन में स्वदेश-प्रेम का |तुम्हें आश्चय होना ही चाहिए, जब तुम देखते हो कि जन-
साधारण में ऐसी कविताएँ: भी बड़े प्रेम से सुनी श्रौर गायी जाती
हैं, जिनमें न तो कोई श्रनोता भाव होता है, न झ्जीब-जीब
उक्तया; न श्रलंकारपूणं सुन्दर भाषा ही । श्र जिनमें व्याकरण
तक की टाँग टूटी होती हैं; छन्द:-शाख््र का भी ठीक-ठीक पालन
नदीं होता । संतोष इतना ही है कि ऐसी भट्दी चीज़ों श्र्थात्
लोक-यीतों दौर संत-वाणी ने ग्रामीण जनता में दी श्रधिक श्रादर
पाया है । इन कविताओं ने ज्यादातर देहात के अनपढ़ लोगों को
ही विमोह्ति किया है ।कवि, ऐसे लोगों की अरसिकता को देखकर 'तु्म्हें मन में हँसी
तो ्राती होगी, जो उन साखियों श्ौर सबदों के श्रट्पटे साँचे में
ग्रपना सुन्दर जीवन टालना चाहते हैं । मन में तुम कहते होगे कि
विधाता ने उन ग्रामीणों को रस, कला ्ौर सौन्दर्य परखने की
श्रक्ल क्यों नहीं दी! |पर ऐसी बात नहीं है कि तुम रुप होकर ग्राम्य जनता के
जीवन को उपेक्षा को दृष्टि से देखते हो । नहीं, कभी-कभी तुम्हारी
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