धरती धन न अपना | Dharti Dhan Na Apna

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Book Image : धरती धन न अपना  - Dharti Dhan Na Apna

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ग्रे चाची के जाने वे बाद बाली कुछ समय तक खाट पर लेटा रहा! छ बप मे विछोह ने उसमे गाँव और इसके वासियां के प्रति अजनवीपन पदा कर दिया था । यह उसे डर लगने लगता नि थाडी ही देर म मुहल्ल की सब स्त्रियाँ बच्चे और कुछ मद उसके घर जमा हो जाएँगे और तरह-तरह वं' प्रश्न पूछेंगे । काली प्रसन्न होने की बजाय बहुत वेचन था नौर चाहता था दि. यह घड़ी कसी तरह व जाए तो अच्छा है । वह खाट पर रेटा करवटें बदल रहा था । रात भर जायते रहन वे' वाव- जूद॑ नीद भौर थकावट उससे कासा दूर थी । जब ल्टे लट उसका मन ऊब गया और चेचैनी और भी वढने लगी तो वहू उठकर अपने काठ को छत पर था गया । बोदी सीठीं के आखिरी डडे पर खड़ा वह सामने दंघने लगा । चमादडी के कोठा से परे दूर तक खुले प्रेत फल़े हुण्थ । वाइ नोर चो वी चमकती रेत थी । चो के दोना ओर बाँध वना दिए गए थे। इहे दंखकर काली को हैरानी भी हुई और खुशी भी । चमादडी के पास ही थो के परले क्नारे पर बड़ के वृक्षा और शीसमा से घिरा हुआ तक्या (चौपाल) था । दाई आर मादिर और महाजना के मकान और चौवारे थ । उनसे पर स्कूछ और नम्वरटारों के मकान और हवल्याँ थी ! पश्चिम मे गप्पिया सादिया, मिट्रा और छुनौतियां (मुहुल्ला के नाम) क॑ मकान और हवल्या थी । वाली ने सीढ़ी के पास ही छत पर खडे होकर चमादडी वे कांठों पर नजर दौड़ार्र । मटमैल रंग के कच्चे और छोटे छोटे कौठे चा व॑' दाएँ किनारे तक फले हुए थे । मुहल्ले के अदर एक छाटा सा चौगान था जिसके बीचो- बीच एवं बेरी थी । चमादडी मे एक ही रूम्दी और तग गली थी जा सारे मुहुल्ले में कही सीधी और कही बल खारर घूम जाती थी । सम से केवछ एव छोटी-सी गली निकलती थी जा बा फत्तू, ताय वसत इत्यादि क' घरा के सामने से होकर थो मे जा निवल्ती थी । मुहर्ल दे वाहर गोदर और कड़े मे ढेर थ और एक-दो छोटे छोटे छप्पड थे निनका पानी मई थी घूप से खुश्क हो चुका था । बहू चमादडी के काठा दो देखने रूगा । भूरे मुहल्ले मे एक भी एसा काठां नहीं था जिसमें पक्की इट लगी हो । पिछली वरप्ात क॑ बाद इन पर अभी लेप नहीं क्या गया था इसलिए वे वमज़ोर और उनवी दीवारें खुरदरी नज़र था रही यी । छगभग प्रत्यक घर से का बडवा घुआँ अल्साया हुआ घरतो धन न अपना श्श्रू




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