वेदांत भारत की मूल संस्कृति | Vedanta Bharat Ki Mool Sanskriti

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श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी - Shree Chakravarti Rajgopalachari

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श्री सीताचरण दीक्षित - Shree Seetacharan Dixit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वेदान्त का स्रोत थअथवा द्कान से खरीद कर पुस्तकें पढ़ना उस समय संभव नहीं था ।वेदान्त में थिव अथवा विष्ण की उपासना के पृथक पंथ नहीं हैं । कौन बड़ा देव है या किस नाम से परमात्मा की लपासना करनी चाहिए--इन प्रदनों का बिदाद वेदान्त में नहीं पाया जाता । दांकराचार्य ने अपने वेदान्त-भाष्य में पर- मात्मा के लिए “नारायण नाम का प्रयोग किया है । दौब-सिद्धांत के ग्रंथों में परमतत्त्व को 'दिव' कहा गया हैं । माम, ध्यान के छिए. परमंदवर के रूप की कल्पनाएं, पूजा की मुतियां और 5 की ध्वनि भी हमारे हृदय को ईस्वर के प्रति आकर्षित करने के साधन-मात्र हैं । बेदान्त हम सब भारहीयों की--चाहे हम किसी भी धर्म में ाछित-पोषित बयां ने हुए हो-नपरंपशागत सामान्य सम्पत्ति है ।




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