मेरा विद्यार्थी जीवन | Mera Vidyarthi Jivan

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Mera Vidyarthi Jivan by मोहनदास करमचंद गांधी - Mohandas Karamchand Gandhi ( Mahatma Gandhi )

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मेरा बचपन ३ लड़क की पट्टी देखकर हिज्जे सुधार खेने को कहते हें। मन यह माना था कि शिक्षक तो यंह देख रहे हैं कि हम एक-दूसरे की पट्टी में देख कर चोरी न करें । सब लड़कों के पांचों शब्द सही निकले, और अकेला में बंवक॒फ़ ठहरा ! शिक्षक ने मरे मेरी बेवक़फ़ी बाद में समभायी लेकिन मरे मन पर उनके समभाने का कोई असर न हुआ। म॑ दूसरे लड़कों को पट्टी मे देखकर चोरी करना कभी सीख न सका। इतने पर भी शिक्षक के प्रति मेरा विनय कभी कम न हुआ। बड़ों के दोष न देखने का गुण मुभमें स्वभाव से ही था। बाद में इन शिक्षक के दूसरे दोष भी मुझे मालम हुए थे। फिर भी उनके प्रति मेरा आदर तो बना ही रहा। म॑ यह जानता था कि बड़ों की आज्ञा का पालन करना चाहिये। वे जो कहें सो करना; करें, उसके काजी न बनना । दो ओर घटनाएं इसी समय के दो ओर प्रसंग मुभ हमेशा याद रहे हं । साधारणतः पाठशाला कौ पुस्तकों को छोड़- कर और कुछ पढ़ने का मुझे शोक़ नहीं था । सबक याद करना चाहिये, उलाहना सहा नहीं जाता, शिक्षक को धोखा देना ठीक नहीं, इसलिये पाठ याद करता था। लेकिन मन अलसा जाता, इस से अकसर सबक़ कच्चा रह जाता। ऐसी हालत में दूसरी कोई चीज पठने की इच्छा क्यों कर होती? किन्त पिताजी कौ खरीदी हुई एक पुस्तक पर मेरी दृष्टि




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