नैवेद्य | Naivedh

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Naivedh  by हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

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He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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দানা জিপ है शिगुंण, हे सर्वं गुणाश्रय, हे निरुपम, दे उपमामय ! दे अरूप, हे सर्वरूप-मय, 2 शाश्वत, ई शान्ति-निख्य | ই जज, आदि, अनादि, अनामय, है अनन्त, है अविनाशी] ই सच्ित्‌-आनन्दक्षान-घन, दत-हीन घट-घट-वासी ॥ है शिव, साक्षी, शुद्ध, सनातन, सर्ब॑र्ित, है सर्वाधार! हे शुम-मन्दिर, खुन्दर, हे शुचि, सौम्य, साम्यमति, रदित विकार ॥ ই अन्तर्यामी, अन्तरतर, भम, भचर, है अकर, अपार ! दे निरीह हे नरनारायण, नित्य. निरञ्नन, नव-सुङ्कमार ॥ हे नव-नीरद्‌-नीर नराङृति, निराकार, दहै नीराकार) है समदर्शो, सन्‍्त-खुखाकर, हे लीलामय, प्रभु साकार हे भूमा, है विभु, त्रिसुवनएति, खुरपति, मायापति, भगवान ! है अनाथपति, पतित-उधारन, जन-तारन, है दयानिधान ॥ हे दुर्चरुकी शक्ति, निराधयके आश्रय, हे दीनदयाल ! है दानी, है प्रणत-पाटः, है शरणागत-चत्सरः जन-पार ॥ है केशव, है करुणा-सागर, हे कोमल अति खुहृद महान! करणा कर अव उभय अभय चरणों मुभे दीजिये स्थान ॥ सुरमुनि-वन्दित, कमलानन्दित, चरण तव मस्तक धार | परम सुखी हो जाऊँगा मैं, हंगा सहज भवाणंव पार] ১:63




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