नदी के दीप | Nadi Ke Deep

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Nadi Ke Deep by अज्ञेय - Agyey

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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' - Sachchidananda Vatsyayan 'Agyey' के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शी नदी के ट्ीप १७ के सहज चैथिल्य के द्वारा मानो रेखा ने अपनी सारी क्लान्त शक्तियों को विश्वाम देकर पुनरुद्दीपित कर लिया था । ब्रैसे ही जैसे नास्तिको की भीड में कोई भक्त अनदेखें क्षण-भर भाँख बन्द कर के अपने आराध्य का ध्यान कर ले और उस के द्वारा नये विदवास से भर कर कर्म-रत हो जाय । रेखा जैसी आधुनिका के लिए भवत की उपमा शायद ठीक न हो पर उस तुलना के द्वारा रेखा का पार्थक्य और उभर आता था और यह बात बार-बार भुवन के सामने आती थी कि रेखा में एक दूरी है एक अलगाव है कि वह जिस समाज से घिरी है और जिस का केन्द्र है उस से अछूती भी है--यद्यपि कहाँ अस्तित्व के कौन से स्तर पर वह विभाजन-रेखा है जो दोनो को अलग रखती है इस की -कत्पना वह नही कर सकता था काफी पीते-पीते ये सब बाते चलचित्र-सी उस के आगें घूम गयी । और जैसे रेखा की रहस्यमयता उसे चुनौती देने ठगी । यो व्यक्तित्व की चुनौती की प्रतिक्रिया भुवन मे प्राय सर्वदा नकारात्मक ही होती है--वह अपने को समझा लेता है कि चुनौती के उत्तर में किसी व्यक्तित्व मे पैठना चाहना अनधिकार चेष्टा है टाँग अडाना है क्योकि व्यक्तित्वो का सम्मिठन या परिचय तो फूल के खिलने की तरह एक सहज क्रिया होना चाहिये । पर रेखा के व्यक्तित्व की चुनौती को उसने इस प्रकार नही टाला टालने की बात ही उस के मन में नही आयी रहस्यमयता की चुनौती स्वीकार करना तो और भी अधिक टाँग अडाना है--क्योकि किसी का रहस्य उद्घाटित करना चाहने वाला कोई कौन होता है --यह भी उसने नहीं सोचा पर अनधिकार हस्तक्षेप की भावना भी उस के मन मे नही थी । यह जो जन-समुदाय से घिरे रह कर भी उस से अलग जा कर किसी भलक्षित दवित के स्पद्ष॑ से दीप्त हो उठने जेसी बात उसने देखी थी रह-रह कर वही भुवन को झकझोर जाती थी जैसे किसी बडे चौडे पाट वाली नदी में एक छोटे-से द्वीप का तरु-प्रल्लवित मुकुट किसी को अपनी अनपेक्षितता से चौका जाय । या कि अँधेरे में किसी शीतल चमकती चीज को देख कर बार-बार उसे छू कर देखने को मन चाहे--कहाँ से किस रहस्यमय रासायनिक क्रिया से यह ठडा आलोक उत्पन्न होता है ? रेखा को देखते और इस ढंग की बात सोचते हुए भुवन कदाचित्‌ अनमना हो गया था वयोकि उसने सहसा जाना चन्द्र और रेखा मे यह बहस चल रही है कि सत्य क्‍या है भर कब कैसे यह आरम्भ हो गयी उसने लक्ष्य नही किया था । चन्द्र कह रहा था सत्य सभी कुछ ह--सभी कुछ जो है। होना ही सत्य की एक- मात्र कसौटी है । रेखा ने टोका लेकिन होने को तो झूठ भी हैं छल भी है भ्रम भी है--क्या वह सब भी सत्य है या कि आप होने की कुछ दूसरी परिभाषा करेगे--पर यह कहना तो यही हुआ कि सत्य वह है जो सत्य है । नही सभी कुछ जो है। यानी उस मे मिथ्या भी शामिल है भ्रम भी । मुझे अगर सगे.




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