श्री शक्तिगीता भाषानुवादसहिता | Shrishaktigeeta Bhashanuvadsahita

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Shrishaktigeeta Bhashanuvadsahita by विवेकानन्द - Vivekanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रीशक्तिगीता । ट् श्रावये शक्तिगीतां तामिदा्नी श्रूयतां खल। ' . महदादेवीपदाम्भोजचअरीकडदा लया ॥ ११ ॥ गीतेय॑ सारभूताइस्ति सव्योंपानपदां हिता .। निष्कर्पः सर्ववेदानां जननी ज्ञानवचेसाम ॥ १२ ॥ पुरा देवामुरे युद्धे साक्षाह्रसस्वरुपिणीम । जगदस्वां महाटेवीं समाराध्य दिपोकस! ॥ १३ ॥ विविधेरिधिभि। सूत ! विजय लापिरे यदा । अम्वायज्ञमनुष्याय ततस्ते विधिएवक्म ॥ १४ ॥ दिटशाअक्रिरे देवी विधूतकटमपास्तदा । तस्मिन-काले तु देवपनीरदस्योपटेशुत। ॥ १५ ॥ विविद्षियुधा। सर्वे यन्पणिद्वीपपुनमण । तेयेचप्यस्विकालोक समासाथ मोखरी ॥ १६ ॥ दर शक्या तथाधप्येते सर्व्वे गन्तें न शकतुयु। तत्र देवा! कियन्तस्तु कियन्माजपयरतथा ॥ ९७ ॥ सनकयकतवनणयकककक काका फिफकणकााध ०५ #0001000 का फफासपकाप्वकर्टवोद अप वन दानव बिता एस फल पवशासपातत श्र मददादेवीके पदरूपी कमलमें सदा लीन रहता है ॥ ११ ॥ यह सब उपनिपदोकी साररूपा, चेदोका निप्क्ष और शानज्योति की जननी है ॥१२। पुराकारलंमं जब सात्तात्‌ प्रह्मरुपिणी जगन्मात- रुपघारिणी महादेब्रीकी शनेक प्रकारसे उपासना करके देवताशोने देवासुर संग्राममं जय प्राप्त किया था और इस जयलामके अन्तर विधिपूर्वक श्रम्यायप्रका अनु्टान कर ' चिधूतकट्मप होकर महावे- वीके दर्शन छा करनेकी उन्होंने इच्छा कीथी, उस समय देवर्षि मारदके उपदेश द्वारा उनको यह दिद्ित हुआ था कि यद्यपि देवी- लोकरूपी 'मणिद्वीपमें जाकर जगन्माताका दर्शन प्राप्त हो सक्ता है - परम्तु घहां सब देवता पहुंच. नहीं सक्ते, फेचठ कुछ देवता और झछ,. फऋषिगण दी पहुँचनेकी सामर्थ्य रखते हैं, सोभी महादेवीकी ' कृपा 1 थ ः र्ग




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