भक्ति और वेदान्त | Bhakti Aur Vedant

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Bhakti Aur Vedant by स्वामी विवेकानंद - Swami Vivekanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मेरे पथ-प्रदर्शक- १५ ऋषियों की सन्तान है ! से कि पश्चिम मे निर्धन से निर्धन जन भी अपनी उत्पत्ति किसी तेरहवीं शताब्दी के ढाऊू सर्दार -से हूँढ निक्ालने में अपना गैरव समभता है, उसी प्रकार भार- सीय सिंहासन पर वेठा हुआ एक चक्रवर्ती सम्राद भी, किसी चनचारी मिज्लुक ऋषि फा, जिसने वल्छल-वस्य पहन, कन्द मूल- फ़ल खाकर, परमेश्वर के अनन्त सौन्दर्य के दर्शाव किए हों, अपने आपको वंशन घताऋर गौरव मानता है। ऐसे ही पुरुषों से धस्पत्ति ढँढ निप्मलने में हमारा गौरव है और जब तक पविन्नवा इस अकार पूजी जायगी, सारतवर्ष अमर रहेगा। इसी समय जब भारतवर्प में विविध प्रकार फे सुघार आन्दो- सम हो रहे थे, वंगाल के एक सुदूर गाँव में २० फ़ेबुअरी सन्‌ १८३५ ई० को एक निर्धन ज्रा्मण-दम्पति के एक पुत्र उत्पन्न हुआ । वालक के माता-पिग दोनों ही कटर ह्मण थे। एक सच्चे फट्टर ब्राह्मण झा जीवन वास्तव में त्याग का जीवन होता है। उसके लिए घहुत थोड़े पेशे हैं और केवल घन-दौलत उत्पन्न करने का तो वह फोई कार्य नहीं कर सकता । उसे फिर दूसरों का दान भी न लेसा चाहिए | आप लोग सोच सकते हैं, इसका ज्ीवत कितना कठोर होता होगा ¦ धप लोगों ने ब्राह्मण जाति फे विपये अनेफ আবি सुनी होंगी; पर कभी अपने हृदय में यह न सोचा होगा कि भला, ऐसी क्या वात है जिससे इस जाति ने अन्य जावियों पर इतना प्रभाव जमा रक्खा है। देश की सभी जातियों में यह जाति सवसे अधिक ग्ररीव है। उनके प्रभाव का रदरव है, उनका




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