कलयुग का महाप्रलय | Kalayug Ka Mahapralay

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Kalayug Ka Mahapralay by विजय मेहता - VIJAY MEHTA

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१८ ` कलयुग कौ महाप्रलय के लिए बनाया था, हम उसके गुलाम बन चुके हें और उसकी इच्छा के बिना एक पग भी इधर-उधर नहीं रख सकते । भौर याद रखिए क्या यह सब प्रगति है, हाँ यह प्रगति है \ जनसंख्या कौ वृद्धि ओर उस भयानक जन-संख्या की भिन्न-भिन्न प्रकार की भीषणमूष को शान्त करने के कायं करना प्रगति है) क्या यह प्रगति की गलत परिभाषा नहीं है ? यदि आप इस परिभाषा से सहमत नहीं हैं तो मानवता का इतिहास खोल कर देख लीजिए । उद्योगीकरण ঘ্ব से आज तक की घटनाओं पर नजर दौड़ाइये । उद्योग-धन्धों के बढ़ने से मनुष्य की घन-दौलत में वृद्धि हुई व अन्न का अधिकाय भी हुआ । इससे जन-संख्या में दिन दुगनी रात चौगनी उन्नति हई । उस भयानक जन-संख्या कौ भयानक भूख भी छिड़ी जो स्वाभाविक थी । इससे मनृष्य कापा गौर फिर तेल के कूपो मं तथा कारखानों मं घुस गया । उन पंसों से उसने धन कमाया ओर अन्न मोल लिया । उसका यही चक्कर अभी तक चलरहाटै। विज्ञानके वरदानोंसे ओर कृषि के नये अनुसन्धानं व प्रयोगो से पर्याप्त खानं को भिल गया । किन्तु आज फिर कुछ सीमा तक, विश्व में, किन्तु निस्संदेह हमारे देश में जन- संख्या की वृद्धि और उसकी भीपरण भूख एक ज्वलन्न- समस्या बच चुकी है, जो प्रतिदिद हल से बाहर हो रही है । प्रगति के विशेषत: विज्ञान की प्रगति के भीषण परिणामों के भय का आभास: अब मानव को कुछ अधिक होने छगा है। रेडियो समाचार पत्रों, रंगमंच आदि के विकास से मानव को विज्ञान के अभिशापों की अच्छी-खासी जानकारी मिल जाती है, जिससे उस पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। विज्ञान व॒ टेकनीकल प्रगति की सवे-व्यापकता ने हमें पंरस्पर सम्बन्ध व परस्पर सहयोग के क्षेत्र को बरी तरह पछाड़ दिया है। इससे ही आज भय, असुरक्षा व चिन्ता एक विद्यत्‌ की रेखा के समान चारों ओर फंली हुई है । विज्ञान ने जितने वरदान दिये हें उनसे




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