प्रताप पताका | Pratap Pataka
श्रेणी : काव्य / Poetry

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
38
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)# दुआ करे दरगाह, पड़ेन पालो राणा सू ।
ग्रथवा-हुआ करं दरगाह, सपन न दिसे प्रतापसी 1 -पाठांतरप्रताप-पताबाचेरयो লাশ घुमंड, मुगछ-मेघ-मंडठ महा।
पातछ-पवन प्रचंड, खंड-खंड खठ-दठ करयो , १११॥
पेख्याँ चित्र--प्रताप, चित्रलिख्या चकता रहै।
जप-जप अल्ला' जाप, खेर मनावे खौफ सू ॥ ११२॥
सुणताँ नाम 'प्रताप', ठाप तुरँग चेटक तणी।
तुरक लोग खा ताप, सपनं भरदे सूथर्णां ।॥ ११३॥
कीदौ ब्रत-बनवास, जद सु राण प्रतापसी ।
अकबर छोडी आस, निज जीवण-सुख-नींदरी । ११४ ॥
सुरक-युरक मुख साह, हुरक-हुरक हरां -हियो ।
चुरक-चुरक अ्रणयाह, रहै पता म्हाराण सू ।॥ ११५॥
एकल्मि-दीवाण, महारण परतापसी |
राख्यौ भुज रै पाण, घरम-करम हिंदुप्राण रौ॥ ११६॥ `
सोचो सह संसार, होवे किम इकसार ही। द
अकबर . कछ -भ्रवतार, सत-अ्रवतार प्रतापसी ॥ ११७॥
दुसह रात-दिन दाह, रहगी. दिल में साह र।
तम्यौ न॒ सिर नरनाह, प्रण कर राण प्रतापसी ॥ ११८ ॥
इक मजह॒ब इसलाम, चाह्यौं अकबर करण चिते ।
अड़यौ पतौ असि थाम, होबा दियो न हिन्द में ॥ ११६ ॥
मुरगी समझ मिवाड़, बिसमिल्ला करण्याँ मियाँ । द द
नाह पता सू नाड, तुडवा तेतीसा कर्या ॥ १२०॥
ग्रकबर चह्यौ उठाण, फुट जाणनं फायदो ।
मेदपाट म्हाराण-पतौ न भ्रायौ पकड में ॥ १२१॥
ग्रारज जाति श्रनाथ--ब्ही नहं तो-छंत हिन्द में!
पातल तू प्रथिनाथ, हौ संचो हिन्दूपती ॥ १२२॥না ঈদ ०५८५
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