तोड़ो कारा तोड़ो भाग - 3 | Todo Kara Todo Bhag - 3

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Todo Kara Todo Bhag - 3  by नरेन्द्र कोहली - Narendra kohli

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परिव्राजक / 15 “यद्यपि अनेक लोगों की ऐसी मान्यता है, किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता ।” संन्यासी ने उत्तर दिया। “तो ईश्वर की चर्चा आते ही वे मौन कैसे हो जाते थे ?” “मैं यह मानता हूँ कि ऊपर से भयंकर तार्किक होते हुए भी मन से वे अत्यंत भावुक भक्त थे ।” संन्यासी का स्वर अत्यंत मधुर हो गया, “ईश्वर की चर्चा आते ही वे इतने विह्लल हो जाते थे कि कुछ बोल नहीं पाते थे और मौन रह जाते थे।” “क्या ऐसा संभव है ?” मन्मथ बाबू चकित थे। “क्या आपने ऐसा कोई संवेदनशील व्यक्ति नहीं देखा, जो आनंद की बात आने पर विह्लल होकर अश्रुपूर्ण आँखों और गदूगद वाणी के कारण तनिक भी बोल नहीं पाता ?”” मन्मथ बाबू ने चर्चा की दिशा बदल दी, “आप भगवान्‌ को मानते हैं ?” “केवल भगवान्‌ को ही मानता हूँ।”' “श्रीकृष्ण को भगवान्‌ मानते हैं ?” लगा, मन्मथ बाबू अपने मन में चिरसंचित कोई प्रश्न पूछ रहे हों । “हाँ । श्रीकृष्ण को भगवान्‌ नहीं मानूँगा तो और किसे मानूँगा ?” संन्यासी की आँखों में अदूभुत चमक थी । “तो उन्होंने गोपियों से प्रेम कर उनसे विवाह क्यों नहीं किया ?”' “श्रीकृष्ण तो मुझसे भी प्रेम करते हैं, तो कया वे मुझसे विवाह कर लें ?”” संन्यासी पूर्णतः गंभीर था । “आप परिहास कर रहे हैं ।”' “नहीं, मैं पूर्ण गंभीरता से कह रहा हूँ।” संन्यासी ने कहा, “यदि आप श्रीकृष्ण से यह अपेक्षा करते हैं कि वे सारी गोपियों से विवाह कर लेते, तो आप न उनके प्रेम को समझते हैं, न गोपियों के प्रेम को। वह कामविहीन प्रेम था-अलौकिक प्रेम । उसकी परिणति विवाह नहीं, भगवदढ्प्राप्ति थी । काम-संबंध तो उस दिव्य प्रेम को लौकिक धरातल पर ले आता । वृंदावन में श्रीकृष्ण की अवस्था ही क्या थी ? निरे बालक ही तो थे ।”' ““श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी से विवाह क्यों किया ?” “रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण से नारी के रूप में प्रेम किया था, राधा ने भक्त के रूप में ।”' संन्यासी ने उत्तर दिया, “इसीलिए रुक्मिणी को श्रीकृष्ण पुरुष के रूप में मिले और राधा को भगवान्‌ के रूप में ।” संन्यासी ने रुककर मन्मथ बाबू की ओर देखा, “श्रीकृष्ण का प्रेम अपार है । आप जिस रूप में उन्हें भजेंगे, वे उसी रूप में आपको मिलेंगे ।”' मन्मथ बाबू को स्वयं आश्चर्य हुआ : उनके भीतर का ब्राह्म जाने कहाँ सो गया था और वर्षों से सोया उनका वैष्णव पुनः जाग उठा था, “मुझे भी मिलेंगे ?” इस प्रश्न ने संन्यासी को जाने कैसा तो कर दिया उनकी छवि कुछ और ही हो गई” मन्मथ बाबू को लगा, उनके सम्मुख कोई अज्ञात संन्यासी नहीं, स्वयं चैतन्य महाप्रभु बैठे हैं, प्रेम बाँटने वाले निमाई ।” उनकी आँखों में अश्रु थे, मुख पर तेज था और अधरों पर सम्मोहिनी मुस्कान थी । “वे तो कब से आपसे मिलने को अधीर हो रहे हैं।” संन्यासी ने कहा, “आपने ही उन्हे रोक रखा है।”




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